हर जगह से हाथ छूटा अब ये ख़ाली ही रहेगा
डर हमारा अब गया हम को ज़माना देख लेगा
है पकड़ ढीली मेरे हाथों में भी इन उँगलियों की
इक दफ़ा में ही ज़माना ये तुझे अब छीन लेगा
है मुझे ये फ़िक्र या हो तू या कोई ख़्वाब देखूँ
अब मेरी आँखों में कह दे ख़्वाब आँसू क्या रहेगा
क्या कहूँ उस को ज़रूरत भी नहीं मुझ से कहे कुछ
वो अगर मुझ से कहीं कुछ कह भी लेगा क्या कहेगा
— Umashankar Lekhwar















