मेरी ख़ातिर सही मुझ को बचाने के लिए आना
तमाम उम्मीद खो दूँगा मुझे इक बार मिल जाना
मोहब्बत जो नहीं रंजिश सही कुछ तो करें तुम से
बड़ा तैयार था मैं भी मगर ये दिल नहीं माना
चलो फिर याद उन बीते दिनों को फिर करें इस बार
मैं तुम को ख़ुद से पूछूँगा मुझे तुम फिर से ठुकराना
बड़ी ज़िद्दी बड़ी नाज़ुक तेरे जैसी तेरी यादें
मना करता था मैं हर रोज़ आगे से नहीं आना
— Umashankar Lekhwar















