जलाए हैं दिए मैं ने वो जाएगी बुझा कर के
उजाले ख़त्म कर देगी मेरे बनते हुए घर के
तुझे क्यूँ फ़िक्र है क्यूँ वो किसी की हो नहीं सकती
उसे जाना है रोए लाख तू चाहे दिखा मर के
न पकड़ा कर तू उस के हाथ उस को दर्द होता है
उसे क्या है पता पकड़े हुए हैं तू ने डर कर के
मगर ये भी तो सच है ना चली जाएगी वो इक दिन
किसी की बन के दुल्हन उस के हाथों को पकड़ कर के
— Umashankar Lekhwar















