
रूठ सा गया है कुछ मुझ सेे ये नज़ारा भी
रह गया न ख़्वाबों में अब मेरे सितारा भी
वो है चाँद जिस से है ये मेरा जहाँ रौशन
मैं चमक भी जाऊँ तो बन सकूँ न तारा भी
— Umashankar Lekhwar
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