Zaan Farzaan

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Zaan Farzaan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Zaan Farzaan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

आए ग़म-गुसार और मुझ से यूँँ की बात जैसे कोई सोग में करे सुकूँ की बात — Zaan Farzaan
जब उस से मैं ने पूछी हसरतें उस की रहा वो हसरतों से देखता मुझ को — Zaan Farzaan
उम्मीद-ए-तरब मेरे इस दिल को अभी भी है हाँ ग़म हैं बहुत से पर वो रब तो अभी भी है — Zaan Farzaan
गर चाहत का कोई पैमाना होता मैं ने तेरी चाहत को मापा होता — Zaan Farzaan
कहते हैं ऐ इंसान तू अशरफ़-उल-मख़्लूक़ात है ढूँढ़ आख़िर तुझ में भला कौन सी ऐसी बात है — Zaan Farzaan

Ghazal

ख़ुश रहना सीखे इंसान ग़म सहना होगा आसान अपनी हालत ठीक करूँ या रक्खूँ अपनों का ध्यान बहला लेता हूँ ख़ुद को ख़ुद का ही कर के गुन-गान मैं जब आपे में आया लोग हुए मुझ से अनजान दिल के बा-बरकत घर में आते जाते हैं मेहमान सुन मैं तेरा हूँ और बस इतनी है मेरी पहचान मत दुनिया में नुक़्स निकाल ख़ुद का ही होगा नुक़सान हश्र उठाऊँ तो कैसे सर पे है बार-ए-एहसान शहर-ए-ख़िरद में हो कर तुम दिल में रखते हो अरमान चीख़ रही है तन्हाई घर है इस दर्जा सुनसान हैराँ होना छोड़ ही दूँ इतना तो मत कर हैरान घर से दूर है मस्जिद पर पास पड़े है क़ब्रिस्तान कोई तो सुनता था मिरी कौन था वो और कब था 'ज़ान' — Zaan Farzaan
मैं पिछली मोहब्बत की शिद्दत का मारा ज़रा एहतियात अब ज़ियादा करूँगा कि शायद ही अब उस क़दर दिल को अपने किसी के लिए मैं कुशादा करूँगा अभी कल ही मैं ने इरादा किया था कि बस अब मैं उस को भुला दूँगा यक्सर पर आज उस को फिर याद करने लगा हूँ सो हाँ आज फिर से इरादा करूँगा मुझे इस ज़माने के आशिक़ बताएँ कि क्या इतना कमज़ोर है इश्क़ अब का कि ये इश्क़ पुख़्ता तभी होगा जब मैं पिया का बदन बे-लिबादा करूँगा अगरचे मैं पुर-हौसला तो बहुत हूँ मगर अपनी क़िस्मत से वाक़िफ़ भी हूँ मैं सो मुझ को न यूँ हार ही माननी है न मैं जीत जाने का वादा करूँगा मुझे तेरे होने न होने से क्या है तू जान-ए-ग़ज़ल थी मिरी और रहेगी कभी वस्ल से काम लेता था तेरे और अब हिज्र से इस्तिफ़ादा करूँगा — Zaan Farzaan
अगरचे थे तो दोनों ही ग़लत अल्लाह जाने है मगर बस इक ने क्यूँ की माज़रत अल्लाह जाने है करे है पाक ज़ाहिर को कि दुनिया तुझ को समझे नेक मियाँ बातिन का क्या जिस को फ़क़त अल्लाह जाने है अगर तनक़ीद करती है तिरे किरदार पर दुनिया न हो मायूस तेरी असलियत अल्लाह जाने है बशर तो फ़ितरतन माने है मुश्किल को अज़ाब अपना पर उस मुश्किल में जो है आफ़ियत अल्लाह जाने है न हो ग़म बाँटने को कोई गर तो मुतमइन यूँ रह कि है अल्लाह और हर कैफ़ियत अल्लाह जाने है तू इतना सोच मत मंज़िल को आग़ाज़-ए-सफ़र में ही तू बस चल पड़ कि रस्ते अन-गिनत अल्लाह जाने है यहाँ हर शख़्स ख़ुद को लाइक़-ए-बख़्शिश समझता है मगर सँवरेगी किस की आख़िरत अल्लाह जाने है नहीं था बे-सबब उस शख़्स का तुझ से बिछड़ना 'ज़ान' नहीं थी उस को तेरी अहमियत अल्लाह जाने है — Zaan Farzaan
तू जब बा'द-ए-तर्क-ए-तअल्लुक़ बहुत ख़ुश दिखा तब लगा कि गोया तिरी ज़ीस्त का अब तलक मसअला मैं ही था हुआ था जो माज़ी में उस से न कर रोज़-ए-फ़र्दा ख़राब बहुत कुछ हुआ था मगर क्या हुआ जो हुआ सो हुआ ये मासूम दिल मेरा अब भी तलाशे है गुंजाइशें भले ज़ेहन माने कि वो दास्ताँ हो चुकी है फ़ना गँवा एक दूजे को दोनों ने पाया ही है कुछ न कुछ किसी को नया हम-सफ़र मिल गया तो किसी को ख़ुदा मैं ये देख कर ही तो ख़ुश हूँ कि मैं उन की सोचों में हूँ फिर अब वो सताइश करें या बुराई मुझे उस से क्या मलाल इस का कब था कि अहद-ए-वफ़ा उस ने तोड़ा था 'ज़ान' नदामत तो ये थी मैं सब जान कर भी निभाता रहा — Zaan Farzaan
तुझे हो मुबारक तिरी बे-वफ़ाई मैं ख़ुश हूँ कि मैं ने मोहब्बत निभाई तुम्हारा तअल्लुक़ है इक नेक घर से तुम्हें ज़ेब देती नहीं बे-हयाई मिरा दिल दुखा भी तो क्या ग़म कम-अज़-कम असीर-ए-मोहब्बत ने पाई रिहाई नया इश्क़ कर या मना पिछले का ग़म कुआँ तेरे आगे है पीछे है खाई रहे दोस्ती बाद-ए-तर्क-ए-मोहब्बत ये बात आप की रास मुझ को न आई जो मंज़र नहीं देखना चाहता मैं वही मुझ को देता है अक्सर दिखाई ज़माना मुझे गर बुरा कह रहा है ज़माने की होगी इसी में भलाई वो सब्र आज़माए करम करने से क़ब्ल बहुत बार मैं ने ये बात आज़माई उदास आज था मैं सदा की तरह 'ज़ान' सदा की तरह फिर ग़ज़ल गुनगुनाई — Zaan Farzaan
समझ बैठा वो आख़िर ना-समझ मुझ को मैं जिस को ख़ूब कहता था समझ मुझ को बड़ा आसान था शायद समझना पर बड़ी ही देर में आया समझ मुझ को बढ़ा कर प्यास वो मेरी लगा कहने मैं दरिया हूँ मगर सहरा समझ मुझ को जिसे आँखें कभी समझा नहीं पाईं भला उस से मैं क्यूँँ कहता समझ मुझ को न ख़ुदस फ़र्ज़ कर कुछ भी मिरे बारे मैं जैसा हूँ कभी वैसा समझ मुझ को मैं तुझ से भीक क्यूँँ माँगूँ मोहब्बत की न इतना भी गया गुज़रा समझ मुझ को अगर रिश्ते में हो जाए फ़ज़ीहत आम तो उस रिश्ते से वारस्ता समझ मुझ को ब-जुज़ रब के यहाँ है आरज़ी हर साथ कम-अज़-कम आ गया इतना समझ मुझ को ये दिल का टूटना भी लाज़मी था ज़ान कभी आती नहीं वरना समझ मुझ को — Zaan Farzaan
न इस क़दर तू देख ख़ुद को इश्तिबाह से कोई नहीं यहाँ जो बच सका गुनाह से हर एक क़िस्म के हैं ग़म मिरे भी पास पर गुरेज़ कर रहा हूँ मैं मेरी ही आह से मैं तेरा कुछ नहीं ये तेरे लब कहें मगर कभी अयाँ हुआ नहीं तिरी निगाह से मिरी ख़िरद ख़राब कर रही है शा'इरी मुझे ख़बर हुई है मेरे ख़ैर-ख़्वाह से इक आरज़ू हो गर तो हों हज़ार काविशें किसे मिला है कुछ यहाँ पे सिर्फ़ चाह से ये बे-कली मिरे बदन को छोड़ती नहीं कनीज़ कब ख़फ़ा हुई है बादशाह से ज़वाल उस बशर को रब ने लाज़मी दिया कभी सँभल सका नहीं जो इंतिबाह से हुआ है कुछ तो तेरे साथ इश्क़ में जो तू पनाह माँगता है इश्क़-ए-बे-पनाह से वफ़ा की अहमियत फिर उस को क्या पता हो 'ज़ान' सदा जो भागता रहा हो रस्म-ओ-राह से — Zaan Farzaan
तवील रास्ता है हाथ थाम लीजिए कि दिल के साथ अक़्ल से भी काम लीजिए बहार में ख़ुदा को याद कीजिए भी क्यूँँ ख़िज़ाँ में पर उसी का ख़ूब नाम लीजिए अगर दवा-ए-दर्द-ए-दिल है मुझ से गुफ़्तुगू तो आप इस दवा को सुब्ह-ओ-शाम लीजिए सनम से चाह मेरी कुछ न थी ब-जुज़ वफ़ा शबाब पर कहे कि लुत्फ़-ए-आम लीजिए सफ़र में ज़ीस्त के मिले न कुछ गँवाए बिन यहाँ तो जोखिमों को बहर-गाम लीजिए मुनाफ़िक़ों का फ़ैसला ख़ुदा पे छोड़िए मुआ'फ़ कीजिए न इंतिक़ाम लीजिए तआम भी हिदायतों का फिर न हो नसीब न इस क़दर भी लज़्ज़त-ए-हराम लीजिए है जुम्बिश-ए-ज़बान का ये ज़ब्त जब तलक कि तब तलक तो नैन का पयाम लीजिए भले मुहिब हो लाख पर उसूल ये है 'ज़ान' किसी का अपने सर न इत्तिहाम लीजिए — Zaan Farzaan
चाहता हूँ तिरे हर सितम की मुकाफ़ात हो जो मिरे साथ तू ने किया कल तिरे साथ हो रोज़ जब सुब्ह उठता हूँ होता है मन यूँ उदास गोया तेरा बिछड़ना अभी कल ही की बात हो अपनी ख़ल्वत को ज़ाया न कर ये ख़ुदा की है देन ताकि तन्हाई में तेरी तुझ से मुलाक़ात हो और आसान हो ताकि अगली दफ़ा जीतना मात हो ही रही है तो अच्छी तरह मात हो पूरे दिन का थका जिस्म है रात का मुंतज़िर और ये दिल कि जो चाहता ही नहीं रात हो महफ़िल-ए-ग़ैर में मेरी रुस्वाई के पीछे भी कुछ तअज्जुब नहीं गर मिरे अपनों का हाथ हो फिर ही शायद इन आँखों में क़ौस-ए-क़ुज़ह हो अयाँ 'ज़ान' मुमकिन है पहले इन आँखों से बरसात हो — Zaan Farzaan
जतन कर के भी जब वो शय मिली ही नइं तो कह डाला कि हाजत हम को थी ही नइं अगरचे तू समझता है मिरी हर बात मगर वो बात जो अब तक कही ही नइं तअल्लुक़ वो बला है जो अगर टूटे लगे कुछ दिन कि अब तो ज़िंदगी ही नइं जो कर डाला तिरी आदत को मैं ने तर्क किसी की फिर मुझे आदत लगी ही नइं वफ़ा सीखे कोई मेरी उदासी से ये जो आ कर कभी वापस गई ही नइं जो तेरे बा'द अब आई है ख़ल्वत में कोई इस से बड़ी आसूदगी ही नइं जहाँ को छोड़ जब तरजीह दी ख़ुद को जहाँ मुझ को लगा फिर लाज़मी ही नइं रही हैं मुश्किलें काफ़ी सफ़र में पर कभी भी ख़्वाहिश-ए-मंज़िल मरी ही नइं वो क्या दिन थे अज़ीज़ इक आरज़ू थी ज़ान पर अब वो आरज़ू बाक़ी रही ही नइं — Zaan Farzaan
मैं तो अक्सर तन्हाई में बैठे ये सोचूँ अपनों के होते भी क्या मैं इतना तन्हा हूँ माना दुख का नाता मुझ से पैहम है लेकिन कम-अज़-कम ख़ुश रहने की ख़ुश-फ़हमी ही पालूँ कुछ करने से पहले गर सोचूँ तो क्या ही हो बेहतर है जो करना है बिन सोचे कर गुज़रूँ बार अब ज़िम्मेदारी का ढोना है मुझ को भी मुमकिन है अब मैं भी अपने ख़्वाबों को बेचूँ इश्क़-ओ-नफ़रत दोनों ही रस्सी के हैं मानिंद उतना ही आगे जाएँ पीछे जितना खींचूँ सोचा था दुनिया को खो कर ख़ुद को पा लूँगा अब ख़ुद को भी खो बैठा हूँ अब मैं क्या पाऊँ तन मन की इक आज़ारी है ये फ़िक्र-ए-फ़र्दा वो आज़ारी जिस के दम से ही मैं ऐसा हूँ गो ख़ुद को रोके रखता हूँ मुस्तक़बिल को सोच पर उड़ने का मन करता है जब अंबर देखूँ सब वाक़िफ़ हैं हर रस्ते की इक ही मंज़िल है फिर भी रस्ता चुनने में सब इतना सोचें क्यूँँ जो मुझ को दरिया समझें बुझती है उन की प्यास जो सहरा समझें मैं उन को प्यासा ही रक्खूँ बाहरस कामिल जाने है जग सारा मुझ को 'ज़ान' अंदर की वीरानी को बस मैं ही जानूँ — Zaan Farzaan
अगर मुझ को तेरा सहारा न हो मिरा इस जहाँ में गुज़ारा न हो वो हर बार ये कह के बख़्शे ख़ता मगर याद रखना दुबारा न हो न रख इश्क़ में फ़ाइदे की उमीद अगर चाहता है ख़सारा न हो मुक़द्दर भी उस को हराता नहीं जिसे हार जाना गवारा न हो कोई ऐसा फ़ातेह मुझे भी दिखा कभी ज़िंदगी में जो हारा न हो तवज्जोह तिरी चाहता हूँ मैं पर तिरा ध्यान मुझ पे ही सारा न हो बशर में हों चाहे हुनर लाख ही पर एहसाँ जताने का यारा न हो ये इंसाँ मिलेंगे तिरे दर पे ही ब-जुज़ तेरे गर कोई चारा न हो भँवर देखता है सफ़ीने को यूँँ समुंदर का गोया किनारा न हो ख़ुदा-रा न तुम को मिले ऐसा शख़्स तुम्हारा जो हो कर तुम्हारा न हो मोहब्बत हो गर तो मोहब्बत हो बस मोहब्बत का फिर गोशवारा न हो इन आँखों से फिर पूछना मेरा हाल जो हुलिए से गर आशकारा न हो कहीं फिर दवा ज़हर लगने लगे कोई ज़ख़्म इतना भी प्यारा न हो — Zaan Farzaan
तअल्लुक़ जब उस रब से अच्छा हुआ मैं इक ख़ाक से जैसे सोना हुआ मैं जब भी हुआ गुम-शुदा दहर में तिरे पास आया भटकता हुआ मिरे पास क्या है ये पूछे जहाँ मिरे पास तू है तो क्या क्या हुआ मुझे तो नहीं ख़ुद पे भी इख़्तियार हुआ तेरे दम से मैं जैसा हुआ गिनी जब भी मैं ने तिरी नेमतें मिरा दीन-ओ-ईमाँ भी ताज़ा हुआ मैं तकलीफ़ में जब पुकारूँ तुझे दिखे मुझ को आराम आता हुआ गुनहगार हूँ तेरा माना मगर मैं मोमिन हूँ आख़िर ये अच्छा हुआ गिराता भी है तो फ़क़त इस लिए कि देखे तू मुझ को ख़ुद उठता हुआ दिखाता है तू उस को ऊँचा मक़ाम दिखे जो भी सजदों में झुकता हुआ हक़ीक़त है तू मुझ को ईमान है ये दुनिया तो झूठा फ़साना हुआ मैं रखता हूँ बस तुझ पे ही एतिमाद जहाँ में बशर कब बशर का हुआ मुझे शुक्रिया रब का करना था 'ज़ान' ग़ज़ल तो फ़क़त इक बहाना हुआ — Zaan Farzaan
ब-ज़ाहिर है कि अब इस बार उदासी देर तक जाए मगर इस बार डर भी है कि मेरी जाँ न थक जाए ज़मीं वाले ज़मीं वालों के चक्कर में पड़ा है क्यूँँ कहीं तेरे न हाथों से निकल तेरा फ़लक जाए नज़र इतना न आओ तुम कि फिर तुम को ही देखें सब न जाने कौन कब किस की निगाहों में खटक जाए बहुत सीधा है यूँँ तो रास्ता रब तक पहुँचने का मगर वो है तवील इतना कि मुझ जैसा भटक जाए अँधेरे से घिरे इस दिल को बस तेरी ही हाजत है तेरी ताबिंदगी-ए-हुस्न से हर शय चमक जाए मिरी क़िस्मत की है नाराज़गी भी इस क़दर मुझ से मैं जितना पास आ जाऊँ ये उतनी ही खिसक जाए मैं क्यूँँ थक हार कर बैठूँ कि बेहतर है वहाँ चल दूँ जहाँ ले कर मुझे मेरी उमीदों की सड़क जाए तुम आ जाओ मिलो मुझ से मगर इतना सुनो देखो बहुत मुमकिन है आग इस जिस्म की यक-दम भड़क जाए हसीं हो कर भी उस ने सिर्फ़ मुझ से ही मोहब्बत की भला उस की वफ़ाओं पर मिरा कैसे न शक जाए वो इक बच्चा जो अक्सर ही बड़ा होने से कतराए कहो उस से सलीब-ए-वक़्त पर आ कर लटक जाए तू इतनी ख़ूब-सूरत है कि तुझ को रिंद गर देखे तो फिर बस इस क़दर देखे कि जाम उस का छलक जाए मैं दूजों के ग़मों में ख़ूब रो लूँ पर ग़नीमत है कभी ख़ुद के लिए मेरा इक आँसू भी टपक जाए मिरे सब्र-ओ-तहम्मुल ज़ख़्म भी सारे मिटा देंगे ख़याल इक ये नमक हर ज़ख़्म पर आ कर छिड़क जाए अगर करनी मुझे आती तो मैं कब का न कर लेता शुरू कर गुफ़्तुगू तू ही कि मेरी ये झिझक जाए ज़रूरत तो मुझे होगी दलीलों की गवाहों की तिरी पोशाक-ए-गिर्या तो तिरे हर ऐब ढक जाए वो सब से आश्ना भी है तो इस में क्या नया है 'ज़ान' वो है बरसात की ख़ुशबू जो हर इक सू महक जाए — Zaan Farzaan

Nazm

“आदत” कभी जब सोचता हूँ क्या करूँँगा बिन तिरे मुझे अफ़्सुर्दगी महसूस होती है बहुत कि तुझ से पेश्तर तो बस सियह थी ज़िंदगी तिरी आमद ने मानो रंग इस में भर दिए कि अब हर बात को जज़्बात को हालात को मिरी हर फ़िक्र को हर दर्द को हर रंज को मिरी इस बे-बसी या बे-कली या तैश को मिरे हर ग़म को और उन से मिली हर आह को मिरे हर ज़ख़्म और उन से मिले हर दाग़ को मिरी इस ज़िंदगी में पड़ रही उफ़ताद को समझने के लिए तू है मुयस्सर आज तो मगर कल का नहीं मालूम मुझ को क्या करूँँ अगर तू कल नहीं होगा ख़ुदा-ना-ख़्वास्ता ये सब फिर कौन समझेगा मुझे बतला ज़रा ख़याल आता है ये जब भी मुझे तो यूँँ लगे कि गोया चीर ही देगा ये अब सीना मिरा भला कैसे जि यूँँगा बिन तिरे ये ज़िंदगी तू वो आदत है जो मैं छोड़ सकता ही नहीं — Zaan Farzaan
"आँखों की ख़ातिर" उस की आँखों की ख़ातिर या उस की आँखों के वास्ते उस से जुदा होना एक गुनाह है मुझे कि हाँ ये भी एक सबब है उस से जुदा या महजूर न होने का कि जब जब ख़याल-ए-फ़िराक़ आता है मेरे ज़ेहन में तो मैं उस की वो आँखें ही तो याद करता हूँ कि क्या होगा जब छोड़ दूँगा उन आँखों को दरमियान-ए-सफ़र क्या वो अफ़सुर्दा आँखें फिर सह पाएँगी ये महजूरी मेरी वो आँखें जिन में एक उम्र तलक खोया रहा हूँ मैं वो आँखें जो मुझे मुझ से ज़्यादा जानती हैं वो आँखें जिन में महफ़ूज़ हैं सारी यादें सारी बातें सारे लम्हें और सब आलम अपने सुख दुख के वो आँखें जो मेरे हर ख़्वाब को अपना ख़्वाब मानती हैं और जिस के ख़ुद के ख़्वाब मा-तहती हुए हैं वो आँखें जो अपने माज़ी में बड़ी परेशान रही हैं वो आँखें जो मुझे एक उम्मीद से देखती हैं अभी और अब इस मौजूदा हाल में एक सुकून तलाशती हैं मुझ में कहीं वो आँखें जो अभी भी सहमी हुई हैं पर एक कशिश लौटी है मेरे आने से वो आँखें जिन से वा'दा कर चुका हूँ मैं कि कभी सबब-ए-गिर्या न बनूँगा और कभी दरमियान-ए-सफ़र न छोड़ूँगा उन्हें — Zaan Farzaan