Zaan Farzaan

Zaan Farzaan

@Zaanfarzaan

Zaan Farzaan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Zaan Farzaan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
हमीं हैं रिफ़ाक़त में जाँ देते हैं
वगरना सभी बस गुमाँ देते हैं

कभी बात हम बस पते की करें
कभी उल्टे सीधे बयाँ देते हैं

कभी छोटे लोगों में बैठा नहीं
बड़े ख़्वाब इजाज़त कहाँ देते हैं

परे आसमाँ के है कोई जिसे
यूँ आवाज़ दोनों जहाँ देते हैं

कमी बाग़बानी में थी सो चलो
चमन को नया बाग़बाँ देते हैं

हिदायत मिले जाने कब ही तुम्हें
मुअज़्ज़िन तो अब भी अज़ाँ देते हैं

किराए पे रहते थे ख़ुद जो कभी
किराए पे अब वो मकाँ देते हैं

मुकरते नहीं हम किसी हाल पर
अगर हम किसी को ज़बाँ देते हैं

ख़ुदा जानता है कि साबिर हैं हम
सो हाँ रोज़-ओ-शब इम्तिहाँ देते हैं

तेरी चश्म-ए-गिरया के धोके सदा
बहुत सो को दर्द-ए-निहाँ देते हैं

भले मौसमों में भी कैसा सुकूँ
सभी कुछ वो कर राएगाँ देते हैं

करूँ ख़ूबियों का अगर ज़िक्र मैं
गिना वो मेरी ख़ामियाँ देते हैं
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Zaan Farzaan
फिरता रहता हूँ ग़ाफ़िल
क्या यूँ मिलती है मंज़िल

मर जाने के हूँ क़ाबिल
मर जाना क्यूँ है मुश्किल

अपने दिल को रक्खो तुम
मैं रखता हूँ अपना दिल

पहले था वो यकता पर
अब है दुनिया में शामिल

वाक़िफ़ कब होगा दरिया
उसकी हद है ख़ुद साहिल

क्यूँ बस उस की ख़्वाहिश हो
दूजों को जो है हासिल

सुन मेरे ऐ चारा-गर
जीने पर कर दे माइल

मेरी चश्म-ए-तर देखो
तारों की है इक झिलमिल

मेरा सानी है कोई
मुझ बिन जमती है महफ़िल

टूटे दिल के टुकड़ों से
कैसे कुछ होगा कामिल

झूठों से कहता हूँ सच
समझें वो फिर भी बातिल

अब वो शय होगी किस की
जिस शय के हैं सब क़ाबिल

कल के ख़ातिर ज़िंदा हूँ
जो है लाखों का क़ातिल

ग़ुर्बत में भी शुक्राना
देखो करता है साइल

याद आता है कब ही वो
याद आए पैमान-ए-दिल

मैं दुश्मन से बचता हूँ
करते हैं अपने घाइल

कैफ़ आँखों का देखूँ मैं
या देखूँ आरिज़ पर तिल

बद-बख़्ती के रस्तों पर
है माँ की मिन्नत हाइल

ज़ान अब तुम भी ज़िद छोड़ो
लोगो से जाओ घुल-मिल
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Zaan Farzaan
आशिक़ी रुलाती है दोस्ती रुलाती है
हद से हो परे तो हर चीज़ ही रुलाती है

लोग अपनी महफ़िल में खिलखिला तो लेते हैं
रोते हैं अकेले जब सादगी रुलाती है

हर कमी दिखाती है रौशनी मुझे मेरी
रौशनी से निकलूँ तो तीरगी रुलाती है

रोते को हँसाती है ज़िंदगी है ये यारा
चाहे कोई हँसना तो ज़िंदगी रुलाती है

एक उम्र गुज़री थी चैन से जहाँ मेरी
अब वहाँ से गुज़रूँ तो वो गली रुलाती है

बात वो हमारी जो कल तलक रुलाती थी
मैं नहीं बताता पर आज भी रुलाती है

दुश्मनों को तब मेरी दुश्मनी रुलाती थी
दोस्तों को अब मेरी दोस्ती रुलाती है

कोई जब हो हाजत में मैं करूँ मदद उसकी
मुझ को है पता कितना बे-बसी रुलाती है

छोड़ते नहीं हो जो नींद को अभी भी तुम
बाद में अभी की ये नींद भी रुलाती है

मेरे साथ भी अब ये अद्ल है किया रब ने
पहले ग़म हँसाते थे अब ख़ुशी रुलाती है

इस ज़माने की अब तो परवा ही नहीं मुझको
मुझको तो फ़क़त तेरी बे-रुख़ी रुलाती है

हैं हुज़ूर रब के सब अपने अपने मतलब से
कौन है जिसे रब की बंदगी रुलाती है

ख़ुश हो तुम अभी ताज़ा तिश्नगी से पर यारा
बाद में यही बढ़ती तिश्नगी रुलाती है

आदमी से हो या फिर हो किसी खिलौने से
सच कहूँ तो आख़िर में दिल्लगी रुलाती है

ख़ुश जो देखे मुफ़लिस को तो न कर तअज्जुब तू
आम तौर पर तो ये मुफ़लिसी रुलाती है

बात जो ख़फ़ी थी वो हर जगह सुनी मैंने
बात हो यक़ीं की तो लाज़मी रुलाती है

जान उलझनें मेरी देख ना मुसलसल हैं
एक जो सुलझ जाए दूसरी रुलाती है
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