Jaypratap chauhan

Jaypratap chauhan

@Malal

Jaypratap chauhan shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jaypratap chauhan's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अभी से दर्द इतने दे दिए तू ने ख़ुदा मैं तो अभी चौबीस का हूँ बस — Jaypratap chauhan
वो क़ातिल है उसे क़ातिल ही रहने दो कहीं आशिक़ हुआ तो क्या ग़ज़ब होगा — Jaypratap chauhan
कभी मुझ को फ़क़त वो आप कहती थी वही लड़की मिरा अब नाम लेती है — Jaypratap chauhan
मोहब्बत जिस तरह की है तुम्हारी अभी तुम को बहुत कुछ सीखना है — Jaypratap chauhan
आख़िरी शे'र है ये मिरा आख़िरी बार सुन लो मुझे — Jaypratap chauhan
मोहब्बत खा गई है उम्र मेरी नहीं तो मैं अभी चौबीस का हूँ — Jaypratap chauhan
सभी ये पूछते हैं 'जय' कि तुम कैसे बने शाइ'र मिरे इक रात सपने में सुनो इक जौन आया था — Jaypratap chauhan
मुझे जॉन बनने की हसरत नहीं है मैं जय हूँ मुझे जय ही रहने दो यारों — Jaypratap chauhan
किस दुकाँ पर बिक रही है ये मोहब्बत उस दुकाँ का मुझ को यारों तुम पता दो — Jaypratap chauhan
मुसलमानों हुसैनी हो मगर क्या जानते हो तुम ज़मीन-ए-करबला में हिंदुओं ने सर कटाए हैं — Jaypratap chauhan
कई शाइ'र गए आए मगर जय तुम्हारी बात जो है वो अलग है — Jaypratap chauhan

Ghazal

मुझे अब तो सताना छोड़ दो तुम सुनो जलवे दिखाना छोड़ दो तुम तुम्हारी ये हँसी पागल बनाए सुनो यूँँ मुस्कुराना छोड़ दो तुम तुम्हें कोई छुए तो खूँ जले है सुनो मिलना मिलाना छोड़ दो तुम बड़ी मदहोश हैं ये शोख़ नज़रें सुनो काजल लगाना छोड़ दो तुम सुनो अब तो मिरे तुम होंठ चूमो गले से अब लगाना छोड़ दो तुम कभी तो साथ में गुज़रेंगी रातें अरे तकिया दबाना छोड़ दो तुम लबों को चूमती हो पर सुनो जाँ लबों को बस चबाना छोड़ दो तुम मुझे बाँहों में भरती हो भरो जाँ मगर नाखु़न गड़ाना छोड़ दो तुम तुम्हीं ने तो बनाया जय दिवाना चलो उस को दिवाना छोड़ दो तुम — Jaypratap chauhan
भरोसा ही ज़रूरी है यहाँ रिश्ता निभाने को नहीं तो हैं कई बैठे तुम्हारा घर जलाने को भले करते हैं सब तौहीन कस्बी की ही गलियों की मगर हर कोई जाता है हवस अपनी मिटाने को अगर जो बात घर की हो दिखाते जेब को ख़ाली मगर तैयार हैं साहिब नशे में सब लुटाने को अगर दौलत तुम्हारे पास तो दुनिया तुम्हारी है यहाँ क़ीमत अदा होती है हर रिश्ता निभाने को उजाड़ें हैं कई जंगल की जिस ने दाम की ख़ातिर चले हैं अब वही देखो शजर हर घर लगाने को मिरे मातम पे वैसे तो कई हैं लोग सुन लो 'जय' मगर अपने नहीं आए मिरा मातम मनाने को — Jaypratap chauhan
कहीं अपनों को मारा तो कहीं पर पीर को मारा अरे इंसाँ बदल तू ने सुना तक़दीर को मारा हुई सब कुछ यहाँ दौलत भला ये क्या ज़माना है सुना दौलत की ख़ातिर भाई ने हमशीर को मारा तरस आया नहीं नन्हीं सी बच्ची पर दरिंदों को दबा गर्दन जो नन्हीं जान की फिर रीर को मारा हमें काफ़िर बताते हो बताओ क्यूँँ मुसलमानों कहीं भी हिंदुओं ने क्या कभी शब्बीर को मारा नहीं छोड़ा महीने छह के उस नन्हें से असगर को उसे भी मारने ख़ातिर गले पर तीर को मारा ज़माने से सुना है 'जय' तुम्हारी यार ग़ज़लों ने कभी ग़ालिब को रौंदा है कभी तो मीर को मारा — Jaypratap chauhan