कहीं अपनों को मारा तो कहीं पर पीर को मारा
अरे इंसाँ बदल तू ने सुना तक़दीर को मारा
हुई सब कुछ यहाँ दौलत भला ये क्या ज़माना है
सुना दौलत की ख़ातिर भाई ने हमशीर को मारा
तरस आया नहीं नन्हीं सी बच्ची पर दरिंदों को
दबा गर्दन जो नन्हीं जान की फिर रीर को मारा
हमें काफ़िर बताते हो बताओ क्यूँ मुसलमानों
कहीं भी हिंदुओं ने क्या कभी शब्बीर को मारा
नहीं छोड़ा महीने छह के उस नन्हें से असगर को
उसे भी मारने ख़ातिर गले पर तीर को मारा
ज़माने से सुना है 'जय' तुम्हारी यार ग़ज़लों ने
कभी ग़ालिब को रौंदा है कभी तो मीर को मारा
— Jaypratap chauhan















