दिवाना हमें तुम बना कर गए हो
शब-ए-हिज्र में तुम रुला कर गए हो
सभी के लिए बस मोहब्बत मज़ा है
यही तुम बहाना बना कर गए हो
मिले जो मुझे ग़म सभी कम लगे हैं
यही ग़म बहुत तुम जलाकर गए हो
किया था कभी एक वा'दा सनम जो
बड़ा ख़ूब उस को निभा कर गए हो
नहीं मानता कोई मुंसिफ़ तुम्हें मैं
ग़लत फ़ैसला जो सुनाकर गए हो
ख़ुशी बाँटता था सभी को कभी जय
मगर तुम उसे भी रुला कर गए हो
— Jaypratap chauhan















