जाने न कुछ भी बे-ख़बर ये ज़िंदगी
लगने लगी अब बे-असर ये ज़िंदगी
पड़ने लगी मेरे बदन पे झुर्रियाँ
अब तो करे मेरी क़दर ये ज़िंदगी
कोई न है रहबर न कोई यार है
ऐसे नहीं होगी बसर ये ज़िंदगी
कोई शिकायत हो अगर कह दो मुझे
मुझ पर बची है मुख़्तसर ये ज़िंदगी
— Jaypratap chauhan















