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नहीं है प्यार अब हम को फ़लाने से
न पड़ता फ़र्क़ उस के यार जाने से
न पड़ता फ़र्क़ उस के यार जाने से
रही है याद वो हम को हमेशा ही
नहीं भूले उसे हम तो भुलाने से
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हमें तो ठीक से तो शा'इरी भी अब नहीं आती
पता तो है नहीं कैसे ग़ज़ल शिकवा उतर आया
पता तो है नहीं कैसे ग़ज़ल शिकवा उतर आया
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न ख़ुद को नज़र में गिरा ही सके हम
न ख़ुद को कही पे बिठा ही सके हम
न ख़ुद को कही पे बिठा ही सके हम
बिना दोस्ती के कटी उम्र सारी
न तो ज़ख़्म दिल के दिखा ही सके हम
रही आँख नम हर समय यार दिल की
न ख़ुद को नज़र में झुका ही सके हम
न हँसते हमें तो न होता यही ग़म
रहा जो कि सब को रुला ही सके हम
न थी शोर करने कि आदत हमें तब
न ही तब किसी आँख आ ही सके हम
गले से लगाया पनस को वही पर
जहाँ आबरू को लुटा ही सके हम
रही यार कोशिश यही हर समय बस
न ख़ुद को दिलों में बिठा ही सके हम
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धीरे धीरे से ही मगर चमक तो आता है
धीरे धीरे से ही मगर गमक तो आता है
धीरे धीरे से ही मगर गमक तो आता है
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