na KHud ko nazar men giraa hi sake hamna KHud ko kahii pe bitha hi sake ham | न ख़ुद को नज़र में गिरा ही सके हम

  - Raunak Karn

न ख़ुद को नज़र में गिरा ही सके हम
न ख़ुद को कही पे बिठा ही सके हम

बिना दोस्ती के कटी उम्र सारी
न तो ज़ख़्म दिल के दिखा ही सके हम

रही आँख नम हर समय यार दिल की
न ख़ुद को नज़र में झुका ही सके हम

न हँसते हमें तो न होता यही ग़म
रहा जो कि सब को रुला ही सके हम

न थी शोर करने कि आदत हमें तब
न ही तब किसी आँख आ ही सके हम

गले से लगाया पनस को वही पर
जहाँ आबरू को लुटा ही सके हम

रही यार कोशिश यही हर समय बस
न ख़ुद को दिलों में बिठा ही सके हम

  - Raunak Karn

Bhai Shayari

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