कोई तो था तेरे जैसा बाज़-औक़ात

ख़ैर वो आलम तो बस था बाज़-औक़ात

ख़ूब बातें करती है तन्हाई मुझ से
कुछ यूँ रहता हूँ मैं तन्हा बाज़-औक़ात

ज़ोर पर चलता कहाँ है क़िस्मतों पर
चाहा है क्या क्या न करना बाज़-औक़ात

है मुयस्सर ज़ीस्त इस ताकीद पर अब
ज़्यादा मरना और जीना बाज़-औक़ात

माना था तुझ को सबब अपनी ख़ुशी का
पर बड़ा तू ने रुलाया बाज़-औक़ात

क़ब्र पर बच्चे की कहता वो ग़नी बाप
कुछ नहीं कर पाता पैसा बाज़-औक़ात

कैसे पूरे कर सकूँगा अपने सपने
एक आध आता है सपना बाज़-औक़ात

सोचने से दोस्त आख़िर क्या ही होगा
मैं ने ऐसा भी है सोचा बाज़-औक़ात

— Zaan Farzaan

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