इक मुद्दत बीत गई घर से बाहर हमको
    इक मुद्दत से देखा ही नइँ है घर हमने
    Sagar Sahab Badayuni
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    जब दिल हो मुझसे मिलने आया करती थी
    मैं जानें को कहता रो जाया करती थी

    बातों से दिल भर भी जाता था उसका फिर
    तब जाकर वो मेरा सर खाया करती थी

    इतना काफी है उसको दिल देना मेरा
    मीलों चलकर वो खाना लाया करती थी

    हँसने पर हँसती रोने पर मर जाती थी
    ग़म के बादल में ज़ुल्फ़ें साया करती थी
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    Sagar Sahab Badayuni
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    बचा लेता अगर जो डूबने से इश्क़ में तुमको
    तुम्हें था ज़ो'म दिल में यार गहराई नहीं होती
    Sagar Sahab Badayuni
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    नहीं मालूम वो किस शक्ल में करता मदद मेरी
    फ़रिश्तों की सुनी है यार परछाई नहीं होती
    Sagar Sahab Badayuni
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    दर्द भी मेरी ख़बर अब पूछता है
    मर्ज़ कितना है मुझे बीमार हूँ मैं
    Sagar Sahab Badayuni
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    कर भी रहा है मुश्किलों से बाप बेटी को विदा
    है दायज़ा का बोझ जो दिल से नहीं जा पा रहा
    Sagar Sahab Badayuni
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    मौत मुझ को साथ ले जाने खड़ी है
    बस परेशानी यही बीमार हूंँ मैं
    Sagar Sahab Badayuni
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    अब ज़ख़्म गुनाहों पर अफ़्सोस किया जाए
    तकलीफ़ अज़िय्यत पर अफ़्सोस किया जाए
    Sagar Sahab Badayuni
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    एक मुद्दत से दिल-ए-बीमार हूंँ मैं
    मर्ज़ काफ़ी है मुझे बीमार हूंँ मैं
    Sagar Sahab Badayuni
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    वो ख़्वाब भी जिसका मुझे आता नहीं
    दिल से कभी जो भी गया आता नहीं
    Sagar Sahab Badayuni
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