Sagar Sahab Badayuni

Sagar Sahab Badayuni

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Sagar Sahab Badayuni shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sagar Sahab Badayuni's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तुम लोग बस ऐसे उठा लेना जनाज़ा ये मिरा जैसे किसी डोली में दुल्हन को उठा कर चलते हैं — Sagar Sahab Badayuni
इक उम्मीद जला देती है अंदर से सब कुछ आशिक़ ख़ुद को तो बर्बाद नहीं करता कोई — Sagar Sahab Badayuni
इस ख़ातिर भी इश्क़ मुहब्बत पर लिक्खा नइंँ मैं ने मैं ने चाहा भी ये था बच्चों पर न असर जाए — Sagar Sahab Badayuni
अब मेरा ख़ुद से ही झगड़ा चलता रहता है अब मेरा ख़ुद के घर आना-जाना नइंँ होता — Sagar Sahab Badayuni
ख़ाक ज़िंदा दिली रही अपनी एक औरत हँसा नहीं सकते — Sagar Sahab Badayuni
कभी महफ़िल कभी मुझ को मिरा हमदम बताता है वही जो देख कर चेहरा सभी का ग़म बताता है — Sagar Sahab Badayuni
इधर मिट्टी भी मेरी उठ नहीं पाई मिरे घर से उधर हाथों में मेहँदी भी लगा ली शौक़ से उस ने — Sagar Sahab Badayuni
सब को बताता फिर रहा है अब मिरे किरदार को ख़ुद के जिसे किरदार का अपने पता कुछ भी नहीं — Sagar Sahab Badayuni
शादी के आख़िर मौक़े' पर जा कर बोली है वो मुझ को ले जा तेरी शहज़ादी न कहीं मर जाए — Sagar Sahab Badayuni
साथ विरासत की ख़ुशियाँ रहती मेरे वरना शा'इर को रोने का यार बहाना नइंँ होता — Sagar Sahab Badayuni
जिस्म है फिर रहा उसे ले कर आग ख़ुद को लगा नहीं सकते — Sagar Sahab Badayuni
देख लेगी कहीं मिरा चेहरा आँख में ग़म दिखा नहीं सकते — Sagar Sahab Badayuni
मिरे ग़म का कभी नइंँ बन सका हमदर्द कोई भी मिरी ही मौत को वो अब मिरा मरहम बताता है — Sagar Sahab Badayuni
सब को घुट कर मरने का तोहफ़ा हम देंगे रक्खा ही नइँ इक भी महफ़ूज़ शजर हम ने — Sagar Sahab Badayuni

Ghazal

तो क्या हुआ जो कोई मिरे साथ नहीं है सब ठीक है डरने कि मगर बात नहीं है बे मन से अगर जा रहे हो मिलने उसे तुम सागर ये समझलो वो मुलाक़ात नहीं है नाराज़ हूँ मैं ख़ुद से ख़फ़ा तुझ सेे नहीं हूँ गर हूँ ख़फ़ा इतनी भी बड़ी बात नहीं है हर आग को अपनाने लगूँ अपना कहूँ मैं इतनी भी मिरी ज़िंदगी में रात नहीं है माना के नहीं थी तू मिरे क़त्ल में शामिल कह दे तू मुझे इस में तिरा हाथ नहीं है बस ढोंग दिखाएँगे उदासी का तुम्हें लोग तकलीफ़ दिखा पाए ये औक़ात नहीं है करते ही रहें मिन्नतें फ़ेहरिस्त की तुम से इतने बुरे भी अपने ये हालात नहीं है — Sagar Sahab Badayuni
समझी ही कब थीं तू ने परेशानियाँ मिरी मैं ने अकेले झेली हैं नाकामियाँ मिरी कर लूँगा नाम बा'द में पहले ये देख लूँ करता है कौन शहर में बद-नामियाँ मिरी मुझ सेे न दूर जा कहीं बस बैठ पास में मुझ को ही खा रही हैं ये तन्हाइयाँ मिरी दोनों में फ़ासला है बहुत वक़्त है अभी मुझ पे नहीं गईं अभी परछाइयाँ मिरी होगा नहीं इलाज किसी भी हकीम से जाएँगी साथ मेरे परेशानियाँ मिरी सबने सज़ा सुना दी बड़े शौक़ से मुझे देखी नहीं किसी ने पशेमानियाँ मिरी ग़ुस्से में बोला जो भी बुरा लग गया तुझे इक बार याद करती तो नादानियाँ मिरी दौलत ने इस तरह से चकाचौंध कर दिया आएँगी कब नज़र तुझे अच्छाइयाँ मिरी तहज़ीब सीख जाओगी तुम देख कर सही लाओगी पर कहाँ से वफ़ादारियाँ मिरी इतना उतर न तू मिरी गहराई में अभी हैरान कर न दें तुझे हैरानियाँ मिरी लगता है कम बचे हैं मिरी ज़िंदगी के दिन अल्लाह कुछ तो कम हुई दुश्वारियाँ मिरी — Sagar Sahab Badayuni
इक नज़र देख इन राएगाँ आँखों में तू ही पढ़ पाएगी दास्ताँ आँखों में तुम मुझे छोड़ कर तो नहीं जाओगी सारा सच देख लो मेरी जाँ आँखों में इतना रोती है वो छोटी सी बात पर जैसे दस बीस हों आसमाँ आँखों में उस ने चाहा ही था इस तरह से मुझे आ गया था मिरे भी गुमाँ आँखों में इतनी भी दूर मत जा दिखाई न दे घर न कर लें कहीं दूरियाँ आँखों में इस तरह से गया सब चमक ले गया रह गईं सिर्फ़ खामोशियाँ आँखों में ख़्वाब सब जल गए देखते देखते रह गया बस धुआँ ही धुआँ आँखों में ज़ख़्म तो भर गए वक़्त के साथ पर आज भी दिखते हैं वो निशाँ आँखों में इक हुनर आ नहीं पाया था उम्र भर और आई नहीं इक ज़बाँ आँखों में — Sagar Sahab Badayuni
राह -ए-रसूल चलने को तय्यार कौन है हम जैसा उस ख़ुदा का तलबग़ार कौन है सबने नक़ाब ओढ़ के रक्खे हैं चार पाँच किसपे करें यक़ीं के वफ़ादार कौन है किस के लिए चराग़ ये जलते हैं रात दिन इस दर्जा घर में आप के बीमार कौन है हर बार मेरी पीठ पे होता है वार क्यूँँ अपनों के बीच में छुपा ग़द्दार कौन है अपनी अना पे वो है और अपनी अना पे मैं कैसे हो फ़ैसला के ख़तावार कौन है मुझ को लगा चुके हो ठिकाने से ख़ैर तुम ये तो बताओ अगला गिरफ़्तार कौन है हम ने छुपा लिए हैं सभी ज़ख़्म आँखों में हम से बड़ा यहाँ पे अदाकार कौन है यूँँ ही किसी पे भी लुटा देते हैं आप दिल इतना तो देखिए के ख़रीदार कौन है इस बार हम रक़ीब से मिलने को आए हैं हम भी तो देखें आप का दिलदार कौन है — Sagar Sahab Badayuni
मेरा बेकार गया तुम से शिकायत करना मैं चली जाऊँगी तब मुझ से मुहब्बत करना मैं ने चाहा था के हम साथ दिखें मंडप में देखना पड़ गया उस शख़्स को रुख़्सत करना ख़ुद को मैं देखता हूँ रोज़ तिरी नज़रों से ख़ुद से आसान नहीं होता है नफ़रत करना मैं सिखाता हूँ किसी दिल में जगह कैसे हो आप सिखला रही है दिल पे हुकूमत करना ग़म किसी का भी हो मैं अपना बना लेता हूँ मुझ को कब आएगा इस चीज़ से हिजरत करना मैं ने माना के ग़लत थी मैं मगर अब लेकिन तुम को मेरी है क़सम कुछ भी ग़लत मत करना मैं ने कोशिश भी नहीं की थी कभी जीने की कम से कम तुम तो यहाँ जीने की हिम्मत करना — Sagar Sahab Badayuni
बंद दिल के तालों की चाबियाँ बनाऊँगा इंतिज़ार करने को खिड़कियाँ बनाऊँगा अब नहीं बनाऊँगा ज़ख़्म की दवा कोई ताज़ा ही रहे ऐसी पट्टियाँ बनाऊँगा तुम निभाते ही रहना सब रिवाज़ दुनिया के पर मैं एक बेवा की चूड़ियाँ बनाऊँगा हँसते मुस्कुराते इक चेहरे को बना कर मैं रंग भरतीं उस में कुछ तितलियाँ बनाऊँगा लौट कर नहीं आए जंग पर गए थे जो उन के बच्चों की ख़ातिर बस्तियाँ बनाऊँगा तुम सभी बनाओ बस साज़िशे गिराने की आने वालों की ख़ातिर सीढ़ियाँ बनाऊँगा है उदास लोगों की ज़िम्मेदारी भी मुझ पर ख़ुद कुशी मैं करने को पटरियाँ बनाऊँगा — Sagar Sahab Badayuni

Nazm

"तस्वीर" उदासी इंतिहाई जब भी करती है मिरी तकलीफ़ मुझ सेे वा'दा करती है तिरे हर दुख को अपना दुख ही समझूँगी तुझे कोई नहीं समझा मैं समझूँगी कभी जब सोचता हूँ दूर जाने का तिरी आवाज़ मेरा पीछा करती है नहीं होता है जब कोई भी कमरे में तिरी तस्वीर मुझ सेे बात करती है मिरा ये वहम है या फिर है सच्चाई अकेली पड़ चुकी है दोस्त तन्हाई मिरे कमरे का है जो हाल क्या जानो उदासी मस्त है ख़ुशहाल क्या जानो घड़ी तक रात भर ख़ामोश रहती है तिरी तस्वीर मुझ सेे बात करती है मिरी हालत पे तुम चाहो तरस खाओ मुझे चाहो तो दिखलाओ न दिखलाओ मुझे समझो नहीं समझो मगर उस को कभी जा कर तो कोई यार समझाओ मिरे अंदर किसी ने कर लिया है घर मिरे अंदर हो जितने सब निकल आओ दवा भी अब मुझे बीमार करती है तिरी तस्वीर मुझ सेे बात करती है जिसे सब नींद कहते हैं नहीं आती तुझे भी याद अब मेरी नहीं आती बिना बादल के जब बरसात गिरती है तिरी तस्वीर मुझ सेे बात करती है भला मैं क्यूँँ तुझे हर बात बतलाऊँ ज़रूरी तो नहीं हर चीज़ दिखलाऊँ अगर वो बे-वफ़ा भी है तो होने दो मुहब्बत है किसी से तो भी होने दो किसी के साथ गर ख़ुश है तो रहने दो अगर सब बात हैं उस की तो रहने दो नया ये घर नई दुनिया मुबारक हो नया जोड़ा नया लड़का मुबारक हो तुझे हाथों की मेहँदी भी मुबारक हो तुझे सिंदूर माथे का मुबारक हो मिरी क़िस्मत मिरा गर साथ दे देती मुझे दुनिया ये कहती फिर मुबारक हो मिरी ख़ामोशियों पर आज मत जाना बहुत ख़ुश हूँ तुझे शादी मुबारक हो निशानी का करूँँ मैं क्या जला डालूँ तिरी तस्वीर को मैं क्या जला डालूँ मगर मजबूर मैं ये कर नहीं सकता तुझे ख़ुद से ज़ुदा मैं कर नहीं सकता मिरी सब कोशिशें नाकाम रहती हैं मुझे बातें तिरी बस याद रहती हैं मिरी हर साँस जब एहसान करती है तिरी तस्वीर मुझ सेे बात करती है तुझे मैं याद करता हूँ मिरी ग़लती मैं अब भी प्यार करता हूँ मिरी ग़लती चलो सारी निशानी मैं मिटा दूँगा तिरी तस्वीर को भी मैं जला दूँगा मिरे ग़ुस्से से सब कुछ ख़त्म कर डाला मुझे मुजरिम मुझे पागल बना डाला गया वो मर तू जिस सेे प्यार करती थी तिरी तस्वीर मुझ सेे बात करती थी — Sagar Sahab Badayuni
शाइ'र का दुख खुले सब ज़ख़्म मुझ को रो रो कर आवाज़ देते हैं चले आओ कि तुम तुम को बहुत आवाज़ देते हैं मिरी तन्हाई में मुझ को सहारा देते थे वो अब शजर सब कट रहें हैं पर तुम्हें आवाज़ देते हैं बड़े दिन बा'द ये दिन आज मेरे पास आया है मिरा इक दोस्त बे मतलब ही मुझ सेे मिलने आया है ये सब कुछ छोड़ मैं तुझ को कहानी इक सुनाता हूँ तुझे मैं आज दिल की बात खुल कर के सुनाता हूँ मैं तन्हा रोज़ ख़ुद से बस यही इक बात कहता हूँ जुदा सब क्यूँ हो जाते हैं जिन्हें मैं अपना कहता हूँ मैं वो हूँ ग़म भी जिस के साथ अपना रोना रोते हैं मिरे इस ग़म को सुन कर साथ में दुश्मन भी रोते हैं मैं तो वो ज़ख़्म हूँ जो रोज़ ही बस खुरचे जाते हैं तिरी ही याद में मरते हैं बस फिर मर ही जाते हैं हक़ीक़त में किसी पर कोई भी इतना नहीं मरता ज़रा सा सब्र कर कोई मुहब्बत में नहीं मरता मैं भटका इक मुसाफ़िर हूँ भटकता फिर रहा कब से मैं वो दरिया किनारे को तरसता फिर रहा कब से ज़रा सी बात पर ये दिल उदासी में खो जाता है मिरा तू हो भी सकता है ये कहदे क्या ही जाता है यहाँ पर रोज़ पंछी छोड़ कर घर अपना जाते हैं यहाँ दिल के सताए लोग बस पागल हो जाते हैं मैं तो वो हूँ दिए भी क़ब्र पर जिस के नहीं होते मिरे दुश्मन तो होते हैं मिरे अपने नहीं होते बता वो कौन है जिस ने मिरा ये हाल जाना है मिरा दम रोज़ घुटता है किसी दिन घुट ही जाना है यही इक बात सीने में दबाए जा रहा हूँ मैं मैं ख़ुद को खा रहा अंदर से ख़ुद को खा रहा हूँ मैं मिरे ज़ख़्मों की क्या कोई दवा मरहम मिरी होगी बता तू रास्ता जिस सेे उदासी कम मिरी होगी तिरी ज़ुल्फ़ों के ये साए हमारा दिल छुएँगे कब तिरी आग़ोश में कब होंगे हम तुझ को छुएँगे कब मैं वो वीरान जो होने को होता था कभी घर भी मिरे आँगन में बच्चों का लगा रहता था मज़मा भी यहाँ अब कौन कहने पर किसी का अपना होता है मगर ये सच है शाइ'र का भला कब कौन होता है — Sagar Sahab Badayuni