Sagar Sahab Badayuni

Sagar Sahab Badayuni

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Sagar Sahab Badayuni shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sagar Sahab Badayuni's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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तुम लोग बस ऐसे उठा लेना जनाज़ा ये मिरा
जैसे किसी डोली में दुल्हन को उठाकर चलते हैं
Sagar Sahab Badayuni
इधर मिट्टी भी मेरी उठ नहीं पाई मिरे घर से
उधर हाथों में मेहँदी भी लगा ली शौक़ से उसने
Sagar Sahab Badayuni
दर-ब-दर किसी जानिब रोज़ चल रहा हूँ मैं
इक अज़ीब सूरत में ख़ुद ही ढल रहा हूँ मैं

कौन जल गया अंदर कौन मर गया मुझमें
किसकी मौत पर तन्हा रोज़ जल रहा हूँ मैं

इतना कहने पर भी जब बदली ही नहीं दुनिया
बे-वजह ही ख़ुद को फिर क्यों बदल रहा हूँ मैं

ख़ाक हो चुका है दिल चल रही मिरी साँसें
रफ़्ता रफ़्ता ही ख़ुद के दिन निगल रहा हूँ मैं

ज़िंदगी भला अब यह किस तरह बसर होगी
आज कल ग़मों से भी कब बहल रहा हूँ मैं
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Sagar Sahab Badayuni
सबको बताता फिर रहा है अब मिरे किरदार को
ख़ुद के जिसे किरदार का अपने पता कुछ भी नहीं
Sagar Sahab Badayuni
किसके बुलाने पर चला आया यहाँ
है कौन वो जिसका नज़ारा कट गया

क्या एक टुकड़ा भी बचा सकता नहीं
क्या दिल मिरा पूरा ख़ुदारा कट गया
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Sagar Sahab Badayuni
हर आख़िरी था जो सहारा कट गया
हमने जिसे दुख में पुकारा कट गया

हमको बुढ़ापा भी जवानी में मिला
बचपन कहीं जैसे हमारा कट गया
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Sagar Sahab Badayuni
इक उम्मीद जला देती है अंदर से सब कुछ
आशिक़ ख़ुद को तो बर्बाद नहीं करता कोई
Sagar Sahab Badayuni
पहले पहल जब बात हुआ करती थी
घंटो लंबी रात हुआ करती थी

कोई बच्चा घर को नहीं जाता था
गाँव में जब बरसात हुआ करती थी
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Sagar Sahab Badayuni
इस ख़ातिर भी इश्क़ मुहब्बत पर लिक्खा नइंँ मैं ने
मैं ने चाहा भी ये था बच्चों पर न असर जाए
Sagar Sahab Badayuni
शादी के आख़िर मौक़े पर जाकर बोली है वो
मुझको ले जा तेरी शहज़ादी न कहीं मर जाए
Sagar Sahab Badayuni
अब मेरा ख़ुद से ही झगड़ा चलता रहता है
अब मेरा ख़ुद के घर आना-जाना नइंँ होता
Sagar Sahab Badayuni
साथ विरासत की ख़ुशियाँ रहती मेरे वरना
शा'इर को रोने का यार बहाना नइंँ होता
Sagar Sahab Badayuni
दर्द ग़म परेशानी कुछ नहीं मुहब्बत में
काश वक़्त पर मेरा इख़्तियार कर लेतीं

आज ये मिरी वहशत भी मिरी ब-दौलत है
मौत पर ज़रा हमको याद यार कर लेतीं
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Sagar Sahab Badayuni
जिस्म है फिर रहा उसे लेकर
आग ख़ुद को लगा नहीं सकते
Sagar Sahab Badayuni
ख़ाक ज़िंदा दिली रही अपनी
एक औरत हँसा नहीं सकते
Sagar Sahab Badayuni
देख लेगी कहीं मिरा चेहरा
आँख में ग़म दिखा नहीं सकते
Sagar Sahab Badayuni
ख़ाक ही ख़ाक है बची मुझमें
ख़ाक का घर बना नहीं सकते
Sagar Sahab Badayuni
मिरे ग़म का कभी नइंँ बन सका हमदर्द कोई भी
मिरी ही मौत को वो अब मिरा मरहम बताता है
Sagar Sahab Badayuni
कभी महफ़िल कभी मुझको मिरा हमदम बताता है
वही जो देख कर चेहरा सभी का ग़म बताता है
Sagar Sahab Badayuni
सबको घुट कर मरने का तोहफ़ा हम देंगे
रक्खा ही नइँ इक भी महफ़ूज़ शजर हमने
Sagar Sahab Badayuni

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