दर-ब-दर किसी जानिब रोज़ चल रहा हूँ मैं

इक अज़ीब सूरत में ख़ुद ही ढल रहा हूँ मैं

कौन जल गया अंदर कौन मर गया मुझ
में
किस की मौत पर तन्हा रोज़ जल रहा हूँ मैं

इतना कहने पर भी जब बदली ही नहीं दुनिया
बे-वजह ही ख़ुद को फिर क्यूँ बदल रहा हूँ मैं

ख़ाक हो चुका है दिल चल रही मिरी साँसें
रफ़्ता रफ़्ता ही ख़ुद के दिन निगल रहा हूँ मैं

ज़िंदगी भला अब ये किस तरह बसर होगी
आज कल ग़मों से भी कब बहल रहा हूँ मैं

— Sagar Sahab Badayuni

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