ख़ुद अपनी ज़ात में महसूर हो गया हूँ मैं
ये ज़ख़्म कौन सा है जिस में मुब्तिला हूँ मैं
सज़ा है जब से मेरे सर पे ताज शोहरत का
हर एक शख़्स की आँखों में खल रहा हूँ मैं
वक़्त लगता है ज़माने पे असर होने तक
दाद की फ़िक्र नहीं अर्ज़-ए-हुनर होने तक
आतिश-ए-हिज्र में जलते हैं शरर होने तक
बूझ न जाए कहीं हम लोग सहर होने तक
तुम किसी घर को हिक़ारत से न देखो यारो
उम्र लगती है यहाँ ठाट का घर होने तक
दिन गुज़रता है इसी सोच में हर रोज़ मिरा
रात किस हाल में गुज़रेगी सहर होने तक
यूँ तो मुश्किल भी मगर आज ग़ज़ल की ज़ुल्फ़ें
हम सँवारेगे यहाँ रात बसर होने तक
आज उन लोगों ने पलकों पे बिठा रखा है
कल को जो ख़ुश थे मेरे ज़ेर-ओ-ज़बर होने तक
आया जाया करो कूचे में हमारे, वरना
"ख़ाक हो जाएंगे हम तुमको ख़बर होने तक"
हो जो अल्ताफ़ निगाहों में कभी ताब-ए-नज़र
देखते जाईये क़तरे को गुहर होने तक
इश्क़-ए-अहमद जिसे मयस्सर नईं
ख़ुल्द भी उसका फिर मुक़द्दर नईं
आप की सोहबतों के सदक़े में
क्या है वो चीज़ जो मुअत्तर नईं
इस तरहा तेरे होश उड़ाएंगे किसी दिन
महफ़िल में ग़ज़ल हम जो सुनाएंगे किसी दिन
ये सोच के अब तक रहे बीमार, के हम को
वो शरबत-ए-दीदार पिलायेंगे किसी दिन
है मुझ को यकी इश्क़ में उस शोख अदा के
हम शहर से क्या जान से जाएंगे किसी दिन
माना के है इस काम में रुसवाई भी, लेकिन
हम बार-ए-मोहब्बत भी उठाएंगे किसी दिन
क्या चीज़ है रह रह के उन्हें तकना बताओ
वो हम को गुनहगार बनाएंगे किसी दिन
जो ज़ुल्फ़े परिशान में उलझें हैं उन्हें हम
आदाब-ए-जूनु याद दिलाएंगे किसी दिन
जो देखे हैं अल्ताफ़ हिक़ारत कि नज़र से
वो लोग ही पलकों पे बिठाएंगे किसी दिन
उस मोड़ पे गुज़री है मेरी ज़िन्दगी 'अल्ताफ़'
जिस मोड़ पे पल भर कोई ठहरा नहीं करते
कभी दरिया कभी तारों का मंज़र क़ैद करता हूँ
किसी क़े हुस्न का जादू नज़र भर क़ैद करता हूँ
मैं शायर हूँ मुझे अल्लाह ने ऐसा हुनर बख्शा
मैं कागज़ की लकीरों में समंदर क़ैद करता हूँ
मेरे हिस्से में दिवारें थी, किसी को दर दिए
यूं न जाने हम ने घर के कितने टुकड़े कर दिए
हर किसी को लुत्फ़ आजाये यहाँ ये सोच कर
हम ने इन अलफ़ाज़ को फिर शेर के पैकर दिए
हाय क्या दौर-ए-जिहालत है! नये शायर यहाँ
उस्से आगे उड़ रहे हैं जिसने इनको पर दिए
हाँ वही इक शख्स जिस पर था भरोसा भी बहोत
बस उसी ने दर्द बख्शा, दिल के टुकड़े कर दिए
आज वो ख़ुश है नुमाइश करके ज़ख्मों कि मिरे
कल जिसे मैं ने हिफाज़त के लिए पत्थर दिए
इक वही हमको मनाज़िर में कही दिख ना सका
जिस ने इन आँखों को ऐसे ख़ूब तर मंज़र दिए
बेपर-ओ-बाली कि खाई में गिरे थे जो कभी
हमने उन को भी उड़ानो के लिए शह पर दिए
ग़म है दुनिया में नहीं कर पाए कुछ अल्ताफ़ पर
हम ने रौशन दान में चिडिया को नन्हें घर दिए