इस तरहा तेरे होश उड़ाएंगे किसी दिन
महफ़िल में ग़ज़ल हम जो सुनाएंगे किसी दिन
ये सोच के अब तक रहे बीमार, के हम को
वो शरबत-ए-दीदार पिलाएँगे किसी दिन
है मुझ को यकी इश्क़ में उस शोख अदा के
हम शहर से क्या जान से जाएँगे किसी दिन
माना के है इस काम में रुसवाई भी, लेकिन
हम बार-ए-मोहब्बत भी उठाएँगे किसी दिन
क्या चीज़ है रह रह के उन्हें तकना बताओ
वो हम को गुनहगार बनाएँगे किसी दिन
जो ज़ुल्फ़े परिशान में उलझें हैं उन्हें हम
आदाब-ए-जूनु याद दिलाएँगे किसी दिन
जो देखे हैं अल्ताफ़ हिक़ारत कि नज़र से
वो लोग ही पलकों पे बिठाएंगे किसी दिन
— Altaf Iqbal















