बाक़ी भी उम्र लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर के साथ
गुज़रेगी जिस तरह भी गुज़ारेंगे मर के साथ
पैहम मिला के अपनी नज़र उस नज़र के साथ
थे ज़िन्दगी की राह पे इक फ़ितना गर के साथ
ऐ! चश्म-ए-आफ़ताब इधर भी निगाह हो
बैठा हूँ राह पर मैं उम्मीद-ए-सहर के साथ
इस तेज़ गाम दौर में हक़ का अलम लिए
ज़िंदा है कोई मरहल-ए-सख़्त-तर के साथ
बदला नए ज़माने में, मैं ने न रास्ता
साबित क़दम रहा मैं तिरी रह गुज़र के साथ
नेज़े पे सर रखा तो बुलंदी मिली मुझे
कहने को क्या किया नहीं दुनिया ने सर के साथ
अल्ताफ़ मंज़िलो के निशाँ दूर तक न थे
चलने को रास्ते पे चले राहबर के साथ
— Altaf Iqbal















