Rahul

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@_shades_of_ink_

Rahul shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Rahul's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

आ जो गया हूँ तुम्हारी गली में आके मुझे तुम गले से लगा लो — Rahul
इतने दिन बा'द आई हो मतलब आज तक तुम को याद भी था मैं — Rahul
कितना मुश्किल था भुलाना तुझ को याद करने के सबब थे कितने — Rahul
तेरी नफ़ासत से गुज़ारिश है मिरी ऐसी ही तू रहना ये ख़्वाहिश है मिरी — Rahul
तुम अपना वक़्त बदलो पर अपनी घड़ी न बदलो तुम — Rahul
अब ज़िन्दगी से कोई मिरा वास्ता नहीं पर ख़ुद-कुशी भी कोई सही रास्ता नहीं — Rahul
उस की दौलत से शनासाई है देर से बात समझ आई है — Rahul
एक दिन तुम खो दोगी मुझे एक दिन तुम को पा लूँगा मैं — Rahul
तुम सेे बातें करता हूँ जब लगता है तब ज़िंदा हूँ मैं — Rahul
टूटा है इक सपना मेरा कौन है अब अपना मेरा — Rahul
सबकी आँखों में हवस है उस की आँखों में हया है — Rahul

Ghazal

Nazm

"इंतिज़ार" जब कभी बारिश ज़मीं को छूती है मुझे याद आता है वो वक़्त जब हम दस क़दम की दूरी पर रहते थे दस क़दम की दूरी अब दो सौ दस मील में बदल गई है वो सब कुछ बदल गया है जो सोचा भी नहीं था क्या तू भी बदल गई है अगर हाँ तो उन मसाइल को समझ वक़्त रहते जिन का हल न मिला मुझे मुझे अफ़सोस भी है कि एक लफ़्ज़ भी न कहा तुझ सेे इतना डर लगता था मुझे मैं जानता हूँ मोहब्बत डरने वालों का काम नहीं है ख़बर तुझे भी है ख़बर मुझे भी है मेरी मोहब्बत नाकाम नहीं है नाकाम तो मैं हूँ दुनिया की नज़र में कच्चा घर जिस के सामने कच्ची गलियाँ तेरे शौक़ के लिए यहाँ कुछ भी नहीं है हाँ मगर ज़रूरत का सब सामान है काग़ज़, क़लम, शजर, महकती कलियाँ वो कलियाँ जिन्हें कब से तेरे एक लम्स की दरकार है वो शजर जो बूढ़ा हो गया है उस सेे कहा था कभी किसी ने प्यार तो इंतिज़ार है — Rahul
"हब्स" अब तो लौट आओ बीत गए दिन, मह-ओ-साल तुम इसे खेल समझती हो पस-ए-पर्दा तुम हो ना अब तो बाहर निकल आओ ऐसे कौन याद करता है रोज़ किसी का नाम तस्बीह में कौन पढ़ता है कहीं भूल न जाऊँ तुम्हें फ़क़त इतना ही याद आओ किसी रोज़ तुम्हें ख़त लिखूँगा जिस में सिर्फ़ अपना पता लिखूँगा कोई जवाब नहीं चाहिए तुम सेे बस इतना चाहिए ही तुम सेे ढूँढती हुई तुम ख़ुद आओ अब ख़ल्वत में हब्स है देखो मेरा क्या हश्र है तुम्हारा ख़ुदा का ओहदा है मेरे फ़ायदे का सौदा है तुम थोड़ा ज़क उठाने आओ मैं किस की दस्तरस में हूँ तुम्हें इल्म है हर चीज़ का तुम तो सब कुछ जानती हो तुम किस की दस्तरस में हो उस का नाम ही बताने आओ शायद ये आख़िरी नज़्म हो शायद ये आख़िरी ज़ख़्म हो शायद सब कुछ ख़त्म हो तुम्हारा आना न फ़िज़ूल हो सो यूँँ करो तुम मत आओ — Rahul