"दस्तक"
बाहर कौन है
कोई भी तो नहीं
ऐसा लगा जैसे
किसी ने दस्तक दी
देखो क्या रह गई
कोई खिड़की खुली
चलो चराग़ बुझा दो
रखा है क़रीब ही
सोने के वक़्त यहाँ
आएगा कौन ही
तुम जगा देना मुझे
जो सुनो दस्तक कोई
पानी रख लिया क्या
हाँ, और दवाई भी
अब मैं जो सोचती हूँ
कह देते हो तुम वही
झूठ कहते हैं सब
चार दिन की ज़िन्दगी
सत्तर बरस के हम
साथ हैं आज भी
— Rahul















