था किसी का न सहारा मुझको
फिर किया किसने इशारा मुझको
नाम तक भूल गया अपना जब
नाम से उसने पुकारा मुझको
ढलते दिन भी कभी अच्छे थे जब
नाव कहती थी किनारा मुझको
अब नहीं लगता मुझे जानेगी
जब वो देखेगी दोबारा मुझको
मौत आए तो तरस खाए ख़ुद
ऐसी हालत से गुज़ारा मुझको
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Rahul
our suggestion based on Rahul
As you were reading Bekhabri Shayari Shayari