Rahul
Rahul
Ghazal

था किसी का न सहारा मुझ को

फिर किया किस ने इशारा मुझ को

नाम तक भूल गया अपना जब
नाम से उस ने पुकारा मुझ को

ढलते दिन भी कभी अच्छे थे जब
नाव कहती थी किनारा मुझ को

अब नहीं लगता मुझे जानेगी
जब वो देखेगी दोबारा मुझ को

मौत आए तो तरस खाए ख़ुद
ऐसी हालत से गुज़ारा मुझ को

— Rahul

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