Rahul
Rahul
Nazm

"इंतिज़ार"

जब कभी बारिश
ज़मीं को छूती है
मुझे याद आता है वो वक़्त
जब हम दस क़दम की
दूरी पर रहते थे

दस क़दम की दूरी अब
दो सौ दस मील में बदल गई है
वो सब कुछ बदल गया है
जो सोचा भी नहीं था
क्या तू भी बदल गई है

अगर हाँ तो उन मसाइल को समझ
वक़्त रहते जिन का हल न मिला मुझे
मुझे अफ़सोस भी है कि
एक लफ़्ज़ भी न कहा तुझ से
इतना डर लगता था मुझे

मैं जानता हूँ मोहब्बत
डरने वालों का काम नहीं है
ख़बर तुझे भी है
ख़बर मुझे भी है
मेरी मोहब्बत नाकाम नहीं है

नाकाम तो मैं हूँ दुनिया की नज़र में
कच्चा घर जिस के सामने कच्ची गलियाँ
तेरे शौक़ के लिए यहाँ कुछ भी नहीं है
हाँ मगर ज़रूरत का सब सामान है
काग़ज़, क़लम, शजर, महकती कलियाँ

वो कलियाँ जिन्हें कब से
तेरे एक लम्स की दरकार है
वो शजर जो बूढ़ा हो गया है
उस से कहा था कभी किसी ने
प्यार तो इंतिज़ार है

— Rahul

More by Rahul

Other nazm from the same pen

See all from Rahul →

Intezaar Shayari

Shers of intezaar.

All Intezaar Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling