Ali Ahmad Jalili

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@ali-ahmad-jalili

Ali Ahmad Jalili shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ali Ahmad Jalili's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

लाई है किस मक़ाम पे ये ज़िंदगी मुझे महसूस हो रही है ख़ुद अपनी कमी मुझे — Ali Ahmad Jalili

Ghazal

ख़ुशी ने मुझ को ठुकराया है दर्द-ओ-ग़म ने पाला है गुलों ने बे-रुख़ी की है तो काँटों ने सँभाला है मोहब्बत में ख़याल-ए-साहिल-ओ-मंज़िल है नादानी जो इन राहों में लुट जाए वही तक़दीर वाला है जहाँ भर को मता-ए-लाला-ओ-गुल बख़्शने वालो हमारे दिल का काँटा भी कभी तुम ने निकाला है किनारों से मुझे ऐ ना-ख़ुदाओ दूर ही रखना वहाँ ले कर चलो तूफ़ाँ जहाँ से उठने वाला है चराग़ाँ कर के दिल बहला रहे हो क्या जहाँ वालो अँधेरा लाख रौशन हो उजाला फिर उजाला है नशेमन ही के लुट जाने का ग़म होता तो ग़म क्या था यहाँ तो बेचने वालों ने गुलशन बेच डाला है — Ali Ahmad Jalili
ग़म से मंसूब करूँँ दर्द का रिश्ता दे दूँ ज़िंदगी आ तुझे जीने का सलीक़ा दे दूँ बे-चराग़ी ये तिरी शाम-ए-ग़रीबाँ कब तक चल तुझे जलते मकानों का उजाला दे दूँ ज़िंदगी अब तो यही शक्ल है समझौते की दूर हट जाऊँ तिरी राह से रस्ता दे दूँ तिश्नगी तुझ को बुझाना मुझे मंज़ूर नहीं वर्ना क़तरे की है क्या बात मैं दरिया दे दूँ ली है अँगड़ाई तो फिर हाथ उठा कर रखिए ठहरिए मैं उसे लफ़्ज़ों का लबादा दे दूँ ऐ मिरे फ़न तुझे तकमील को पहुँचाना है आ तुझे ख़ून का मैं आख़िरी क़तरा दे दूँ सूरज आ जाए किसी दिन जो मेरे हाथ 'अली' घोंट दूँ रात का दम सब को उजाला दे दूँ — Ali Ahmad Jalili
ख़ुशी ने मुझ को ठुकराया है दर्द-ओ-ग़म ने पाला है गुलों ने बे-रुख़ी की है तो काँटों ने सँभाला है मोहब्बत में ख़याल-ए-साहिल-ओ-मंज़िल है नादानी जो इन राहों में लुट जाए वही तक़दीर वाला है जहाँ भर को मता-ए-लाला-ओ-गुल बख़्शने वालो हमारे दिल का काँटा भी कभी तुम ने निकाला है किनारों से मुझे ऐ ना-ख़ुदाओ दूर ही रखना वहाँ ले कर चलो तूफ़ाँ जहाँ से उठने वाला है चराग़ाँ कर के दिल बहला रहे हो क्या जहाँ वालो अँधेरा लाख रौशन हो उजाला फिर उजाला है नशेमन ही के लुट जाने का ग़म होता तो ग़म क्या था यहाँ तो बेचने वालों ने गुलशन बेच डाला है — Ali Ahmad Jalili
तुम जो आओगे तो मौसम दूसरा हो जाएगा लू का झोंका भी चलेगा तो सबा हो जाएगा ज़िंदगी में क़त्ल कर के तुझ को निकला था मगर क्या ख़बर थी फिर तिरा ही सामना हो जाएगा नफ़रतों ने हर तरफ़ से घेर रक्खा है हमें जब ये दीवारें गिरेंगी रास्ता हो जाएगा आँधियों का काम चलना है ग़रज़ इस से नहीं पेड़ पर पत्ता रहेगा या जुदा हो जाएगा क्या ख़बर थी ऐ अमीर-ए-शहर तेरे दौर में साँस लेना जुर्म जीना हादसा हो जाएगा आप पैदा तो करें दस्त-ए-हुनर फिर देखिए आप के हाथों में पत्थर आईना हो जाएगा मेरे होंटों पे हँसी आ कर रहेगी ऐ 'अली' एक दिन ये वाक़िआ' भी देखना हो जाएगा — Ali Ahmad Jalili
फ़रेब-ए-निकहत-ओ-गुलज़ार से बचाओ मुझे करम करो किसी सहरा में छोड़ आओ मुझे वो जिंस हूँ मैं जिसे बिक के मुद्दतें गुज़रीं जो हो सके तो कहीं से ख़रीद लाओ मुझे मचल रही है नज़र छू के देखिए उस को सिमट रहा है बदन हाथ मत लगाओ मुझे किसी तरह इन अँधेरों की उम्र तो कम हो जलाने वालो ज़रा देर तक जलाओ मुझे किसी पे अपने सिवा अब नज़र नहीं पड़ती मिरी निगाह से ऐ दोस्तो बचाओ मुझे ये किस की लाश लिए जाते हो उठाए हुए कहीं वो मैं तो नहीं हूँ ज़रा दिखाओ मुझे बिखर चुका हूँ 'अली' मैं ग़ज़ल के शे'रों में बिसात-ए-आरिज़-ओ-लब से समेट लाओ मुझे — Ali Ahmad Jalili
रोके से कहीं हादसा-ए-वक़्त रुका है शोलों से बचा शहर तो शबनम से जला है कमरा किसी मानूस सी ख़ुशबू से बसा है जैसे कोई उठ कर अभी बिस्तर से गया है ये बात अलग है कि मैं जीता हूँ अभी तक होने को तो सौ बार मिरा क़त्ल हुआ है फूलों ने चुरा ली हैं मुझे देख के आँखें काँटों ने बड़ी दूर से पहचान लिया है उस सम्त अभी ख़ून के प्यासे हैं हज़ारों इस सम्त बस इक क़तरा-ए-ख़ूँ और बचा है रूदाद-ए-चराग़ाँ तो बहुत ख़ूब है लेकिन क्या जानिए किस किस का लहू इन में जला है इस रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल पे 'अली' छाप है मेरी ये ज़ौक़-ए-सुख़न मुझ को विरासत में मिला है — Ali Ahmad Jalili