Rahul
Rahul
Ghazal

इक ऐसे शख़्स को मुझे अपना बनाना था

हर रोज़ जिस के पास नया इक बहाना था

लगता था मुझ को हम हैं हमारे ही बीच में
लेकिन हमारे बीच में सारा ज़माना था

मुझ को पता था रात में तारे ही गिनने हैं
बस उस को मेरे साथ में दिन ही बिताना था

घाइल पड़ा हूँ मैं यहाँ वो तो चला गया
सय्याद था वो और मैं उस का निशाना था

तुझ से भी कोई पूछता होगा यूँ ही कभी
कह देती होगी उस से कि झूठा फ़साना था

सौ काम थे मुझे कि न ये हो सका न वो
पहला था ये कि वक़्त भी मुझ को कमाना था

अब तो गुज़र ही जाता हूँ देखे बिना उसे
उस गाँव में कभी मिरा अपना ठिकाना था

— Rahul

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