Rahul
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Nazm

"हब्स"

अब तो लौट आओ
बीत गए दिन, मह-ओ-साल
तुम इसे खेल समझती हो
पस-ए-पर्दा तुम हो ना
अब तो बाहर निकल आओ

ऐसे कौन याद करता है
रोज़ किसी का नाम
तस्बीह में कौन पढ़ता है
कहीं भूल न जाऊँ तुम्हें
फ़क़त इतना ही याद आओ

किसी रोज़ तुम्हें ख़त लिखूँगा
जिस
में सिर्फ़ अपना पता लिखूँगा
कोई जवाब नहीं चाहिए तुम से
बस इतना चाहिए ही तुम से
ढूँढती हुई तुम ख़ुद आओ

अब ख़ल्वत में हब्स है
देखो मेरा क्या हश्र है
तुम्हारा ख़ुदा का ओहदा है
मेरे फ़ायदे का सौदा है
तुम थोड़ा ज़क उठाने आओ

मैं किस की दस्तरस में हूँ
तुम्हें इल्म है हर चीज़ का
तुम तो सब कुछ जानती हो
तुम किस की दस्तरस में हो
उस का नाम ही बताने आओ

शायद ये आख़िरी नज़्म हो
शायद ये आख़िरी ज़ख़्म हो
शायद सब कुछ ख़त्म हो
तुम्हारा आना न फ़िज़ूल हो
सो यूँ करो तुम मत आओ

— Rahul

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