Altaf Iqbal

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@altaf_ke_alfaz

Altaf Iqbal shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Altaf Iqbal's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

पलकों पे कुछ चराग़-ए-तमन्ना लिए हुए आँखों को ख़्वाब-ए-सुबह दिखाता रहा हूँ मैं — Altaf Iqbal
इस ज़िंदगी की फ़िल्म में आराम के सिवा जो होना चाहिए था वही हो नहीं रहा — Altaf Iqbal
वो जब जब भी लबे नाज़ुक से मेरा नाम लेते हैं तो पहले बढ़ के हम अपना कलेजा थाम लेते हैं — Altaf Iqbal
हो फ़िज़ा ख़ुश गरीब ख़ाने की आप ज़हमत तो कीजे आने की — Altaf Iqbal
आप होंठो कि बात करते हो हम ने आँखों से गुफ़्तगू की है — Altaf Iqbal
जहाँ अहसास के पैरों में अक्सर ज़ख़्म आते हैं उन्हीं राहों पे हम यारो टहल के शे'र कहते हैं — Altaf Iqbal
ज़र्फ़ दरकार है यारो ये कोई खेल नहीं ज़ोरे सैलाब को आँखों में छुपा कर रखना — Altaf Iqbal
सिर्फ़ कोशिश का नतीजा ही नहीं है अल्ताफ़ फज़ले रब्बी से ये पाए है किनारे हम ने — Altaf Iqbal
ये मत पूछो के हसरत हम ने इस दिल की कहाँ रख दी हमारी चीज़ थी हम ने जहाँ चाही वहाँ रख दी — Altaf Iqbal
अहदे माज़ी में थे ग़ालिब, दोस्तों देखो ज़रा नाम अपना भी कहीं पर दर्ज मुस्तक़बिल में है — Altaf Iqbal
सफ़ीने को सुख़न के डूब जाने से बचा मौला के नाशायर यहाँ पर अब ग़ज़ल के शे'र कहते हैं — Altaf Iqbal
उस मोड़ पे गुज़री है मेरी ज़िन्दगी 'अल्ताफ़' जिस मोड़ पे पल भर कोई ठहरा नहीं करते — Altaf Iqbal

Ghazal

वक़्त लगता है ज़माने पे असर होने तक दाद की फ़िक्र नहीं अर्ज़-ए-हुनर होने तक आतिश-ए-हिज्र में जलते हैं शरर होने तक बूझ न जाए कहीं हम लोग सहर होने तक तुम किसी घर को हिक़ारत से न देखो यारो उम्र लगती है यहाँ ठाट का घर होने तक दिन गुज़रता है इसी सोच में हर रोज़ मिरा रात किस हाल में गुज़रेगी सहर होने तक यूँँ तो मुश्किल भी मगर आज ग़ज़ल की ज़ुल्फ़ें हम सँवारेगे यहाँ रात बसर होने तक आज उन लोगों ने पलकों पे बिठा रखा है कल को जो ख़ुश थे मेरे ज़ेर-ओ-ज़बर होने तक आया जाया करो कूचे में हमारे, वरना "ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होने तक" हो जो अल्ताफ़ निगाहों में कभी ताब-ए-नज़र देखते जाईये क़तरे को गुहर होने तक — Altaf Iqbal
इस तरहा तेरे होश उड़ाएंगे किसी दिन महफ़िल में ग़ज़ल हम जो सुनाएंगे किसी दिन ये सोच के अब तक रहे बीमार, के हम को वो शरबत-ए-दीदार पिलाएँगे किसी दिन है मुझ को यकी इश्क़ में उस शोख अदा के हम शहर से क्या जान से जाएँगे किसी दिन माना के है इस काम में रुसवाई भी, लेकिन हम बार-ए-मोहब्बत भी उठाएँगे किसी दिन क्या चीज़ है रह रह के उन्हें तकना बताओ वो हम को गुनहगार बनाएँगे किसी दिन जो ज़ुल्फ़े परिशान में उलझें हैं उन्हें हम आदाब-ए-जूनु याद दिलाएँगे किसी दिन जो देखे हैं अल्ताफ़ हिक़ारत कि नज़र से वो लोग ही पलकों पे बिठाएंगे किसी दिन — Altaf Iqbal
बाक़ी भी उम्र लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर के साथ गुज़रेगी जिस तरह भी गुज़ारेंगे मर के साथ पैहम मिला के अपनी नज़र उस नज़र के साथ थे ज़िन्दगी की राह पे इक फ़ितना गर के साथ ऐ! चश्म-ए-आफ़ताब इधर भी निगाह हो बैठा हूँ राह पर मैं उम्मीद-ए-सहर के साथ इस तेज़ गाम दौर में हक़ का अलम लिए ज़िंदा है कोई मरहल-ए-सख़्त-तर के साथ बदला नए ज़माने में, मैं ने न रास्ता साबित क़दम रहा मैं तिरी रह गुज़र के साथ नेज़े पे सर रखा तो बुलंदी मिली मुझे कहने को क्या किया नहीं दुनिया ने सर के साथ अल्ताफ़ मंज़िलो के निशाँ दूर तक न थे चलने को रास्ते पे चले राहबर के साथ — Altaf Iqbal
मेरे हिस्से में दिवारें थी, किसी को दर दिए यूँ न जाने हम ने घर के कितने टुकड़े कर दिए हर किसी को लुत्फ़ आजाये यहाँ ये सोच कर हम ने इन अलफ़ाज़ को फिर शे'र के पैकर दिए हाए क्या दौर-ए-जिहालत है! नए शाइ'र यहाँ उस्से आगे उड़ रहे हैं जिस ने इनको पर दिए हाँ वही इक शख़्स जिस पर था भरोसा भी बहुत बस उसी ने दर्द बख्शा, दिल के टुकड़े कर दिए आज वो ख़ुश है नुमाइश कर के ज़ख़्मों कि मिरे कल जिसे मैं ने हिफाज़त के लिए पत्थर दिए इक वही हम को मनाज़िर में कही दिख ना सका जिस ने इन आँखों को ऐसे ख़ूब तर मंज़र दिए बेपर-ओ-बाली कि खाई में गिरे थे जो कभी हम ने उन को भी उड़ानो के लिए शह पर दिए ग़म है दुनिया में नहीं कर पाए कुछ अल्ताफ़ पर हम ने रौशन दान में चिडिया को नन्हें घर दिए — Altaf Iqbal
हर फ़र्ज़ निभाना है, कभी, ये नहीं सोचा चालाक ज़माना है, कभी, ये नहीं सोचा बच्चों की तो बस फ़ीस ही भरकर हुए ख़ुश हम इनको तो पढ़ाना है कभी, ये नहीं सोचा क्या सादा दिली है, के सताया मुझे जिस ने अब उस को सताना है, कभी, ये न हीं सोचा दौलत को कमाने में यहाँ उम्र गवाँ दी इक रोज़ तो जाना है, कभी, ये नहीं सोचा दुनिया में हमें जो भी मिला, उस्से वफ़ा की हर शख़्स सयाना है, कभी, ये नहीं सोचा सुन कर हुए सब ख़ुश, यहाँ दुनिया की कहानी दो दिन का फ़साना है, कभी, ये नहीं सोचा दौलत नहीं ये सोच के लड़की को किया तर्क अच्छा वो घराना है, कभी, ये नहीं सोचा 'अल्ताफ़' रहे मस्त फ़क़ीरी में हमेशा ठोकर में ज़माना है, कभी, ये नहीं सोचा — Altaf Iqbal
ज़िंदगी कब मुझे इस दर्जा गिराँ थी पहले आप थे साथ तो हर शाम जवाँ थी पहले है तेरी शोख़ निगाहों का तक़ाज़ा वरना हसरत-ए-दीद भी इस दिल में कहाँ थी पहले तू, तिरा ग़म, तिरा यादें, तिरी बातें, तौबा! दामन-ए-दिल में ये दौलत भी कहाँ थी पहले हुस्न को चाहने इक ख़ास अदा मुख़्तस है यूँँ तो कहने को ज़ुलेख़ा भी जवाँ थी पहले इत्र में भीगी हुई ज़ुल्फ़ जो झटकी उस ने जल उठी आग वो दिल में जो निहाँ थी पहले हम उतर आए हैं मैदान-ए-सुख़न में वरना शा'इरी आम, ज़माने में कहाँ थी पहले अब न हम है न ये मैखाना है क़ाएम साक़ी हम जवाँ थे तो हर इक चीज़ जवाँ थी पहले उस सितमगर ने भरा आँख में पानी मेरी वरना आँखों में ये बरसात कहाँ थी पहले हज़रत-ए-सोज़ क़ा अल्ताफ़ करम है वरना इतनी मज़बूत ग़ज़ल तेरी कहाँ थी पहले — Altaf Iqbal