
ख़ुद अपनी ज़ात में महसूर हो गया हूँ मैं
ये ज़ख़्म कौन सा है जिस में मुब्तिला हूँ मैं
सज़ा है जब से मेरे सर पे ताज शोहरत का
हर एक शख़्स की आँखों में खल रहा हूँ मैं
— Altaf Iqbal
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