वक़्त लगता है ज़माने पे असर होने तक

दाद की फ़िक्र नहीं अर्ज़-ए-हुनर होने तक

आतिश-ए-हिज्र में जलते हैं शरर होने तक
बूझ न जाए कहीं हम लोग सहर होने तक

तुम किसी घर को हिक़ारत से न देखो यारो
उम्र लगती है यहाँ ठाट का घर होने तक

दिन गुज़रता है इसी सोच में हर रोज़ मिरा
रात किस हाल में गुज़रेगी सहर होने तक

यूँ तो मुश्किल भी मगर आज ग़ज़ल की ज़ुल्फ़ें
हम सँवारेगे यहाँ रात बसर होने तक

आज उन लोगों ने पलकों पे बिठा रखा है
कल को जो ख़ुश थे मेरे ज़ेर-ओ-ज़बर होने तक

आया जाया करो कूचे में हमारे, वरना
"ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होने तक"

हो जो अल्ताफ़ निगाहों में कभी ताब-ए-नज़र
देखते जाईये क़तरे को गुहर होने तक

— Altaf Iqbal

More by Altaf Iqbal

Other ghazal from the same pen

See all from Altaf Iqbal →

Akhbaar Shayari

Shers of akhbaar.

All Akhbaar Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling