दर्द आए उन्हें नज़र शायद

देख कर मेरी चश्म-ए-तर शायद

बस तसव्वुर में मह जबीनों के

ज़िस्त हो जाएगी बसर शायद
इस लिए बन संवर के रहता हूँ

देख ही लें वो इक नजर शायद
जब भी पूछूँ के इश्क़ है मुझ से

मुझ को कहती है हाँ मगर शायद
तुझ से रिश्ता कोई निकल आए

अजनबी कुछ तो ग़ौर कर शायद
दर्द-ए-दिल और हो गया पुर लुत्फ़

बे-वफ़ा का है ये असर शायद
कल जो कहते थे हम ही सब कुछ है

आज फिरते हैं दर-ब-दर शायद
हाल अल्ताफ देख कर तेरा

रो पड़ा कल तो चारा-गर शायद

— Altaf Iqbal

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