ज़िंदगी कब मुझे इस दर्जा गिराँ थी पहले

आप थे साथ तो हर शाम जवाँ थी पहले

है तेरी शोख़ निगाहों का तक़ाज़ा वरना
हसरत-ए-दीद भी इस दिल में कहाँ थी पहले

तू, तिरा ग़म, तिरा यादें, तिरी बातें, तौबा!
दामन-ए-दिल में ये दौलत भी कहाँ थी पहले

हुस्न को चाहने इक ख़ास अदा मुख़्तस है
यूँ तो कहने को ज़ुलेख़ा भी जवाँ थी पहले

इत्र में भीगी हुई ज़ुल्फ़ जो झटकी उस ने
जल उठी आग वो दिल में जो निहाँ थी पहले

हम उतर आए हैं मैदान-ए-सुख़न में वरना
शा'इरी आम, ज़माने में कहाँ थी पहले

अब न हम है न ये मैखाना है क़ाएम साक़ी
हम जवाँ थे तो हर इक चीज़ जवाँ थी पहले

उस सितमगर ने भरा आँख में पानी मेरी
वरना आँखों में ये बरसात कहाँ थी पहले

हज़रत-ए-सोज़ क़ा अल्ताफ़ करम है वरना
इतनी मज़बूत ग़ज़ल तेरी कहाँ थी पहले

— Altaf Iqbal

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