हो ही जाएगा किसी तरहा गुज़ारा, कहना
फिर भी ये बात मगर उस से दुबारा, कहना
जिस को दुनिया कभी आँखों में लिए फिरती थी
हम ने वो दर्द भी काग़ज़ पे उतारा, कहना
हम फ़क़ीरों ने तिरी याद की मज़दूरी में
माल-ए-ग़म अपना लुटा डाला है सारा, कहना
जिन को किस्मत प' बहुत नाज़ है जा कर उन से
वक़्त आएगा किसी रोज़ हमारा, कहना
वो पलट आए तो ऐ दर्द के मारो उस से
हम ने किस जा उसे रह रह के पुकारा, कहना
उम्र की तल्ख़ हक़ीक़त में तिरा हिज्र सनम
अब तो जिस तौर भी गुज़रा हो गुज़ारा, कहना
— Altaf Iqbal















