हर तौर से मैं एक ही मंज़र की तरह हूँदेखो मुझे बाहरस भी अंदर की तरह हूँहर रोज़ बदलता है मेरी सोच का मौसमशीशा न मुझे जान मैं पत्थर की तरह हूँ— Altaf Iqbal