कि बज़्म-ए-यार में भी आजकल शामिल नहीं होता
बिना तेरे मिरा ये दिल भी मेरा दिल नहीं होता
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तुम्हारे साथ था जब तक, वहीं गलियों में रहता था
सुना है अब, रक़ीबों ने तुम्हारा घर नहीं देखा
सुना है अब, रक़ीबों ने तुम्हारा घर नहीं देखा
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गर मुझे भी मार देना चाहते हो
पहले मेरी ख़्वाहिशों को मार देना
पहले मेरी ख़्वाहिशों को मार देना
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यहाँ पहले कभी ऐसा कोई मंज़र नहीं देखा
कि मैं ने आसमाँ देखा मगर छू कर नहीं देखा
कि मैं ने आसमाँ देखा मगर छू कर नहीं देखा
शिकायत ये नहीं मुझ को कि उस ने साथ छोड़ा है
गिला इतना कि उस ने फिर कभी मुड़कर नहीं देखा
ये जिम्मेदारियों ने इस क़दर से बाँध रक्खा है
बहुत दिन हो गए है मैं ने अपना घर नहीं देखा
ज़रा सा तुम ठहर जाओ तो जी भर देख लूँ तुम को
कि मैं ने चाँद देखा है मगर शब भर नहीं देखा
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ये रिश्ते को बचाने के लिए क्या-क्या नहीं करता
मेरे जैसा यहाँ कोई कभी वा'दा नहीं करता
मेरे जैसा यहाँ कोई कभी वा'दा नहीं करता
अगर तू छोड़ भी जाए तो तुझ को याद आऊँगा
यहाँ कोई तुझे मेरी तरह सज्दा नहीं करता
ये तक़दीर-ए-मुहब्बत में मिली बस हिज्र की रातें
ख़ुदा जो भी अता करता है अब अच्छा नहीं करता
अदम-मौजूदगी में भी उसे ही याद करता हूँ
अगर वो साथ होता तो भला मैं क्या नहीं करता
फलाँ की बात करते हो तो मैं इक बात कहता हूँ
जो तुम से इश्क़ करता है मेरे जितना नहीं करता
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