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सुब्ह से शाम हो जाती है
ज़िंदगी आम हो जाती है
ज़िंदगी आम हो जाती है
सोचूँ जब भी उसे मैं कभी
रात बदनाम हो जाती है
कैसे उस से वफ़ा मैं करूँ
प्यास ये ताम हो जाती है
मुझ से मत पूछो हालत मेरी
लड़की बदनाम हो जाती है
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मुकम्मल कुछ नहीं होता
लहू कोई नहीं धोता
लहू कोई नहीं धोता
किसी को क्या कहूँ मैं अब
मैं ख़ुद भी तो नहीं रोता
जिसे देखो है तन्हा पर
जुदा कोई नहीं होता
है परखा मैं ने ख़ुद को भी
कोई अपना नहीं होता
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