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Top 10 of
Ankur Mishra
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Ankur Mishra
ख़ुद
को
ख़ुद
से
जुदा
कर
लिया
ख़ुद
पे
क्यूँ
एतिदा
कर
लिया
उम्र
गुज़रेगी
रो
रो
के
अब
जाॅं
जो
उसपे
फ़िदा
कर
लिया
जाऊँ
कैसे
ये
घर
छोड़
के
छत
को
ही
जब
रिदा
कर
लिया
हाल
मत
पूछो
मेरा
बशर
क्या
ये
हमने
ख़ुदा
कर
लिया
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कुछ
कहीं
टूटा
सा
लगता
है
मुझ
में
कुछ
छूटा
सा
लगता
है
भर
चुके
हैं
ज़ख़्म
सारे
पर
छाला
इक
फूटा
सा
लगता
है
सबको
है
उसपे
य़कीं
लेकिन
मुझ
को
वो
झूटा
सा
लगता
है
बढ़
गया
बेटे
का
क़द
पर
वो
आज
भी
बूटा
सा
लगता
है
ख़्वाब
सच
सब
हो
भी
जाएँ
तो
सपना
इक
टूटा
सा
लगता
है
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हर
दफ़ा
ख़ुद
से
हारा
हूँ
मैं
टूटता
इक
सितारा
हूँ
मैं
भर
लो
आग़ोश
में
मुझ
को
तुम
आज
भी
बे-सहारा
हूँ
मैं
जाने
कब
से
हूँ
बेघर
यहाँ
जैसे
कोई
किनारा
हूँ
मैं
आके
देखो
तबीयत
मेरी
अपना
ख़ुद
ही
सहारा
हूँ
मैं
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सुब्ह
से
शाम
हो
जाती
है
ज़िंदगी
आम
हो
जाती
है
सोचूँ
जब
भी
उसे
मैं
कभी
रात
बदनाम
हो
जाती
है
कैसे
उस
सेे
वफ़ा
मैं
करूँँ
प्यास
ये
ताम
हो
जाती
है
मुझ
सेे
मत
पूछो
हालत
मेरी
लड़की
बदनाम
हो
जाती
है
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ख़ामुशी
की
मार
हैं
हम
दर-ब-दर
बेज़ार
हैं
हम
थाम
लो
बाहों
में
अपनी
थोड़े
से
बीमार
हैं
हम
तू
ही
अपना
है
हमारा
तेरे
पहरेदार
हैं
हम
है
ख़ुदा
माना
तुझे
फिर
ग़म
से
क्यूँ
दो
चार
हैं
हम
है
तू
बाक़ी
हम
में
अब
भी
कश्ती
तू
पतवार
हैं
हम
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नाम
अब
उस
का
बताने
से
रहे
हम
ये
पर्दा
अब
उठाने
से
रहे
एक
मुद्दत
तक
तलाशा
है
उसे
कर्ज़
कोई
हम
चुकाने
से
रहे
आके
ले
ले
कोई
चाहे
इम्तिहान
हम
कोई
पर्चा
दिखाने
से
रहे
हमनें
सब
सेे
ही
रखा
है
फ़ासला
तुम
हमें
अब
आज़माने
से
रहे
हम
निकल
आए
हैं
उस
दर
से
भी
अब
हम
वफ़ा
तुम
सेे
निभाने
से
रहे
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हमने
ख़ुद
से
भी
उल्फ़त
नहीं
की
बा'द
उसके
मोहब्बत
नहीं
की
मर
गया
मुझ
में
मैं
पर
किसी
ने
उस
सेे
कोई
शिकायत
नहीं
की
छोड़
दूँ
कैसे
मैं
आदत
उस
की
जिस
की
हमनें
हिफ़ाज़त
नहीं
की
ख़ुद
न
दुश्मन
हो
जाएँ
ख़ुदी
के
इसलिए
बस
बग़ावत
नहीं
की
मैं
हूँ
वाक़िफ़
ज़माने
से
अंकुर
इसलिए
कोई
चाहत
नहीं
की
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मिलती
जुलती
वो
सूरत
नज़र
आती
है
हर
किसी
की
ज़रूरत
नज़र
आती
है
रुक
सी
जाती
हैं
नज़रें
उसी
पे
ही
बस
सादगी
की
वो
मूरत
नज़र
आती
है
कैसे
रोकूॅं
मैं
ख़ुद
को
फ़ना
होने
से
ये
मोहब्बत
कुदूरत
नज़र
आती
है
पास
मेरे
नहीं
कुछ
सिवा
मेरे
अब
उस
की
अब
फिर
ज़रूरत
नज़र
आती
है
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दिल
दुखा
कर
भी
ठहरा
हुआ
है
किस
क़दर
इश्क़
गहरा
हुआ
है
मुझ
सेे
मत
पूछो
अब
हाल
मेरा
ये
समुंदर
भी
सहरा
हुआ
है
सच
कहूँ
पास
कुछ
भी
नहीं
पर
दर्द
कब
से
ये
ठहरा
हुआ
है
मैं
निकल
आया
उस
दर
से
भी
अब
जब
से
खिड़की
पे
पहरा
हुआ
है
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मुकम्मल
कुछ
नहीं
होता
लहू
कोई
नहीं
धोता
किसी
को
क्या
कहूँ
मैं
अब
मैं
ख़ुद
भी
तो
नहीं
रोता
जिसे
देखो
है
तन्हा
पर
जुदा
कोई
नहीं
होता
है
परखा
मैं
ने
ख़ुद
को
भी
कोई
अपना
नहीं
होता
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