कुछ कहीं टूटा सा लगता है
मुझ
में कुछ छूटा सा लगता है
भर चुके हैं ज़ख़्म सारे पर
छाला इक फूटा सा लगता है
सब को है उस पे य़कीं लेकिन
मुझ को वो झूटा सा लगता है
बढ़ गया बेटे का क़द पर वो
आज भी बूटा सा लगता है
ख़्वाब सच सब हो भी जाएँ तो
सपना इक टूटा सा लगता है
— Ankur Mishra















