मुकम्मल कुछ नहीं होता
लहू कोई नहीं धोता
किसी को क्या कहूँ मैं अब
मैं ख़ुद भी तो नहीं रोता
जिसे देखो है तन्हा पर
जुदा कोई नहीं होता
है परखा मैं ने ख़ुद को भी
कोई अपना नहीं होता
— Ankur Mishra
लहू कोई नहीं धोता
किसी को क्या कहूँ मैं अब
मैं ख़ुद भी तो नहीं रोता
जिसे देखो है तन्हा पर
जुदा कोई नहीं होता
है परखा मैं ने ख़ुद को भी
कोई अपना नहीं होता
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