यहाँ पहले कभी ऐसा कोई मंज़र नहीं देखा
कि मैं ने आसमाँ देखा मगर छू कर नहीं देखा
शिकायत ये नहीं मुझ को कि उस ने साथ छोड़ा है
गिला इतना कि उस ने फिर कभी मुड़कर नहीं देखा
ये जिम्मेदारियों ने इस क़दर से बाँध रक्खा है
बहुत दिन हो गए है मैं ने अपना घर नहीं देखा
ज़रा सा तुम ठहर जाओ तो जी भर देख लूँ तुम को
कि मैं ने चाँद देखा है मगर शब भर नहीं देखा
— AYUSH SONI















