AYUSH SONI

AYUSH SONI

@I_am_ayush

AYUSH SONI shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in AYUSH SONI's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मैं उस को बेच आया हूँ किसी अफ़सर के हाथों में जिसे मैं बोल आया था तुम्हें दुल्हन बनाऊँगा — AYUSH SONI
फ़क़त जुगनू हूँ मैं, वो चाँदनी है उसी से इस जहाँ में रौशनी है — AYUSH SONI
मातम फ़रेब ज़ख़्म ग़म-ओ-रंज औ ज़हर ज़ालिम बता ये आशिक़ी ने और क्या दिया — AYUSH SONI
आँखों से रात भर यहाँ बहती है इक नदी मैं सुब्ह फ़स्लें सींचता हूँ उस के आब से — AYUSH SONI
सबब मेरे ग़मों का जब कभी पूछेगी वो मुझ सेे मैं उस की ओर देखूँगा ज़रा सा मुस्कुरा दूँगा — AYUSH SONI
मेरे हम उम्र साथी इश्क़ में गर टूट जाए दिल ग़म-ए-हिज्राँ में इक महफ़िल सजाना, शा'इरी करना — AYUSH SONI
मैं तो ख़्वाबों को तिजोरी में छुपाता रह गया और वो आई मेरी नींदें चुरा कर ले गई — AYUSH SONI
मेरे तस्वीर का वा'दा कभी जो कर गई थी वो फ़क़त अब उस मुसव्विर का वो वा'दा याद आता है — AYUSH SONI
जब लगे मुश्किल है यूँँ ही मुस्कुराना लौट आना जब लगे दुनिया है कोई क़ैद-ख़ाना लौट आना — AYUSH SONI
ज़िक्र-ए-शब-ए-फ़िराक़ पे कहता था क्या हुआ कल रात उस के साथ भी ये हादसा हुआ — AYUSH SONI
मेरे अहबाब कहते हैं वो तुम को याद करती है उन्हे कैसे बताऊँ अब मुझे हिचकी नहीं आती — AYUSH SONI
देश के हालात कुछ तो इस क़दर हैं जैसे कोई शाख़ पर बरगद टिका है — AYUSH SONI
तू मेरे बर्बाद होने का सबब है यार अब तक फिर भी तेरा ज़िक्र कर देता हूँ अक्सर शा'इरी में — AYUSH SONI
यहाँ कुछ शे'र मैं ने भी बतौर-ए-ख़ास बोले है कोई जा कर मेरे ये शे'र उस को भी सुना देना — AYUSH SONI
ये दुनिया में मुकम्मल इश्क़ कर के कौन ज़िंदा है मैं ज़िंदा हूँ मगर मैं चाहता हूँ ख़ुद-कुशी करना — AYUSH SONI
एक तुम हो जो कि मुझ सेे दूर होती जा रही हो एक मैं हूँ रफ़्ता रफ़्ता तेरी जानिब आ रहा हूँ — AYUSH SONI
ये इतनी भीड़ क्यूँँ भाई, यहाँ मेला लगा है क्या अरे अच्छा वो छत पर धूप लेने आ गई होगी — AYUSH SONI
सुना है खूब दर्द-ओ-ग़म सुनाते हो जमाने को तो लाओ दर्द अपना सारे का सारा मुझे दे दो — AYUSH SONI

Ghazal

उस के दर पर लौट के अब क्या करना है इश्क़ में मुझ को ख़ूब तमाशा करना है मेरी मुझ सेे बस इतनी सी हसरत है माँ की ख़ातिर कुछ तो अच्छा करना है मुझ को बंसी बन जानें दो मोहन की मुझ को सुर में राधा राधा करना है ये क्या दिल में उस की यादें रखनी है और इस दिल का बोझ भी हल्का करना है मेरी बेटी कह कर दफ़्तर निकली है मुझ को इस दुनिया से झगड़ा करना है जिस कूचे पे उस की खिड़की खुलती है उस कूचे से आना जाना करना है इक शब मजनूँ बोला अपनी लैला से मुझ को इश्क़ में जिस्म का सौदा करना है उस को रब्त-ए-ख़ास से भी इनकार नहीं उस को दूजा रब्त भी पैदा करना है ग़ालिब का दीवान सजा दो कमरे में इस कमरे में और उजाला करना है — AYUSH SONI
किसी को याद कर लूँ ऐसी हसरत ही नहीं होती मेरी अब इश्क़ करने की तबीअत ही नहीं होती कि तुम ने भी बहुत से वादे तोड़े पाँच सालों में यहाँ इक मैं हूँ जिस सेे ये सियासत ही नहीं होती यूँँ अरसों बा'द मिल कर पूछते हो हाल तुम, मेरा अगर तुम साथ होते तो ये हालत ही नहीं होती ज़माने ने दिए है लाख दर्द-ओ-ग़म मुझे ऐसे मुझे अब रात भर अश्क़ों की क़िल्लत ही नहीं होती कभी दो झूठ बोले थे मेरे माँ बाप से मैं ने तभी से अब तलक मिलने की हिम्मत ही नहीं होती मेरे यारों मेरी मसरूफ़ियत पर क्या गिला करना मैं ख़ुद से भी नहीं मिलता, कि फ़ुर्सत ही नहीं होती — AYUSH SONI
ख़ुश्क हैं आँखें मेरी और फ़ुर्सत-ए-मातम नहीं और मेरे गाँव में बरसात का मौसम नहीं चूम कर माथे को कहते हो कि फिर मिलते हैं हम ये ग़म-ए-उल्फ़त है जानाँ ये कोई मरहम नहीं तू अमन की बात करने आ गया है पर तेरे हाथ में ख़ंजर है, तेरे हाथ में परचम नहीं मैं तो तन्हा रह भी लूँ यारों ज़माने में मगर दिल परेशाँ करता है, इस का कोई महरम नहीं जिस तरह से तुम मेरे ख़्वाबों में आते हो सनम मेरी ख़ातिर तेरे ख़्वाबों में वही आलम नहीं कल सियासी जश्न में इक शख़्स ने हँसकर कहा ये लिबास-ए-मुफ़्लिसी है सिल्क या रेशम नहीं तुम जो कहते थे हज़ारों हैं तेरी तस्वीर, पर जानता था मैं कि तेरे पास वो अल्बम नहीं ज़िंदगी को ज़िंदगी का नाम तो दे दूँ मगर ज़िंदगी मेरी जहन्नुम से ज़रा भी कम नहीं — AYUSH SONI

Nazm

“पुरुष की कल्पनाएँ" दफ़्तर से लौट कर थका हुआ पलँग पर बेहोश सा लेटा हुआ एक पुरुष अपने मन में कैसी कल्पना करता है वो कल्पना करता है उस दिन की जब वो सभी सामाजिक बंधनों से मुक्त किसी नदी या झील के किनारे बैठा होगा जब वो सुन सकेगा सुब्ह के पंछियों की आवाज़ें जब वो देख सकेगा ढलता हुआ सूर्य जब वो भी गिन सकेगा आसमान के तारे जब वो महसूस कर सकेगा अपने आस-पास के वातावरण में मौजूद शांति सभी प्रकार की चिंताओं से परे जब वो सुन सकेगा हृदय की बातें जब वो बातें कर सकेगा ख़ुद से जब नहीं खलेगी उसे ये बेपरवाही और भाने लगेगा अकेलापन इस अकेलेपन में वो सुन रहा होगा कोई मधुर संगीत जिस की धुन में उस के पैर थिरकने के लिए उत्साहित हो रहे होंगे किंतु इसी बीच अरनिमा अपने कोमल हाथों से उस के पलकों को स्पर्श करती है और उसे खींच लाती है काल्पनिक लोक से बाहर वो उठता है और अपनी काल्पनिकता को अपने थैले में भरकर फिर से दफ़्तर के रास्ते चल पड़ता है उस की आत्मा से महज़ एक आवाज़ आती है आदमी की कल्पनाएँ क्षणभंगुर होती हैं। — AYUSH SONI