माज़ी की तल्ख़ियों भी ऊपर चला गयावो शख़्स मेरी लाश से होकर चला गयामैं रोकता रहा उसे भी बारहा मगरवो धीरे धीरे रूह के अंदर चला गया— AYUSH SONI