गो कि हम ने बहुत किया मालूम
ज़िंदगी का नहीं हुआ मालूम
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मुझ को दरकार मेरे जैसा कुछ
मैं ने चाहा है यार कैसा कुछ
मैं ने चाहा है यार कैसा कुछ
मैं ने सोचा नहीं था ऐसा कुछ
हो गया है यहाँ पे ऐसा कुछ
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न हम आबाद कहते हैं, न हम बर्बाद कहते हैं
उसे जो कि मरीज़-ए-इश्क़ है, फ़रहाद कहते हैं
उसे जो कि मरीज़-ए-इश्क़ है, फ़रहाद कहते हैं
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नसीब अपना खुला नहीं है
जो चाहिए था मिला नहीं है
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सर से सौदाई का भूत उतरे ज़रा
हम मुहब्बत में डूबे है गहरे ज़रा
हम मुहब्बत में डूबे है गहरे ज़रा
कह दो उन से कि आते है हम तो ज़रा
सामने रख के शीशे को संवरे ज़रा
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