गो कि हम ने बहुत किया मालूम
ज़िंदगी का नहीं हुआ मालूम
कुछ हमारे भी हक़ में पढ़ लेना
आप को हो अगर दुआ मालूम
मुझ को दरकार मेरे जैसा कुछ
मैंने चाहा है यार कैसा कुछ
मैंने सोचा नहीं था ऐसा कुछ
हो गया है यहाँ पे ऐसा कुछ
चूँकि रोना बहाल रहता है
ख़ुश्क आँखों का हाल रहता है
नींद आँखों से क्यूँ गुरेज़ा है
रात भर ये सवाल रहता है
न हम आबाद कहते हैं, न हम बरबाद कहते हैं
उसे जो कि मरीज़-ए-इश्क़ है, फरहाद कहते हैं
ये क़ैफियत है कि जब मेरा यार आँख में है
गुलों का रंग, फिज़ां की बहार आँख में है
नसीब अपना खुला नहीं है
जो चाहिए था मिला नहीं है
उसी पे अटका है फ़िर से जाकर
कुशादा दिल है भरा नहीं है
हमारे नाम के चर्चे हमें बदनाम करते है
सुलूक अच्छा तो करते है बुरा अंजाम करते है
सर से सौदाई का भूत उतरे ज़रा
हम मुहब्बत में डूबे है गहरे ज़रा
कह दो उनसे कि आते है हम तो ज़रा
सामने रख के शीशे को संवरे ज़रा