जैसे असीर हो के रिहा इक अज़ाब से
कोई निकल के आ गया है अपने ख़्वाब से
आँखों से रात भर यहाँ बहती है इक नदी
मैं सुब्ह फ़स्लें सींचता हूँ उसके आब से
इक शब डरा दिया दिये ने तीरगी को फ़िर
वो कर रहा बराबरी अब आफ़ताब से
साक़ी पिला दे घूँट मुझे उसके चश्म की
चढ़ता नहीं नशा मुझे तेरे शराब से
सच बोल के मिलेगी सज़ा उम्र क़ैद की
मैं डर रहा हूँ मुल्क़ में इस इंक़िलाब से
मुद्दत से, गुल किताब में रक्खा सहेज कर
आती है आज भी तेरी ख़ुशबू किताब से
यूँ हाथ जोड़ने का सलीक़ा तो सीख ले
तू बात कर रहा है किसी कामयाब से
दो-चार यार, इश्क़, सफ़र और शाइरी
अब चल रही है ज़िंदगी मेरे हिसाब से
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