ख़ुश्क हैं आँखें मेरी और फ़ुर्सत-ए-मातम नहीं

और मेरे गाँव में बरसात का मौसम नहीं

चूम कर माथे को कहते हो कि फिर मिलते हैं हम
ये ग़म-ए-उल्फ़त है जानाँ ये कोई मरहम नहीं

तू अमन की बात करने आ गया है पर तेरे
हाथ में ख़ंजर है, तेरे हाथ में परचम नहीं

मैं तो तन्हा रह भी लूँ यारों ज़माने में मगर
दिल परेशाँ करता है, इस का कोई महरम नहीं

जिस तरह से तुम मेरे ख़्वाबों में आते हो सनम
मेरी ख़ातिर तेरे ख़्वाबों में वही आलम नहीं

कल सियासी जश्न में इक शख़्स ने हँसकर कहा
ये लिबास-ए-मुफ़्लिसी है सिल्क या रेशम नहीं

तुम जो कहते थे हज़ारों हैं तेरी तस्वीर, पर
जानता था मैं कि तेरे पास वो अल्बम नहीं

ज़िंदगी को ज़िंदगी का नाम तो दे दूँ मगर
ज़िंदगी मेरी जहन्नुम से ज़रा भी कम नहीं

— AYUSH SONI

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