सियासतदान हो, आता नहीं है फ़ैसला करना
चलो तुम मय-कदे, इन मसअलों पर मशवरा करना
वो रूठी है, मैं काफ़िर हूँ, ख़ुदा का आसरा ही क्या
न जाने कब मैं सीखूँगा मुझे ख़ुद से रिहा करना
अगर हर फ़ैसले में साथ चलने का किया वा'दा
तो उस के ब्याह में उस को मसर्रत से विदा करना
मुहब्बत उन से करने का मेरा ही फ़ैसला था तो
ये दर्द-ओ-ग़म, शब-ए-हिज्राँ पे उन से क्या गिला करना
दवा, उल्फ़त के दर्दों की मुयस्सर है नहीं तुम को
मैं इक शाइ'र बताता हूँ उसी से राब्ता करना
— AYUSH SONI















