सियासतदान हो, आता नहीं है फ़ैसला करना
चलो तुम मयकदे, इन मसअलों पर मशवरा करना
वो रूठी है, मैं काफ़िर हूँ, ख़ुदा का आसरा ही क्या
न जाने कब मैं सीखूँगा मुझे ख़ुद से रिहा करना
अगर हर फ़ैसले में साथ चलने का किया वा'दा
तो उसके ब्याह में उसको मसर्रत से विदा करना
मुहब्बत उन से करने का मेरा ही फ़ैसला था तो
ये दर्द-ओ-ग़म, शब-ए-हिज्राँ पे उन सेे क्या गिला करना
दवा, उल्फ़त के दर्दों की मुयस्सर है नहीं तुमको
मैं इक शाइर बताता हूँ उसी से राब्ता करना
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