बैठ कर हम उसे बस निहारा किए
    ज़िन्दगी इस क़दर हम गुज़ारा किए

    रेत पर नाम लिख के हज़ारों दफ़ा
    बारहा उसको ही हम पुकारा किए

    जब भी देखा उसे ग़ौर से देर तक
    अपनी नज़रों से नज़रें उतारा किए

    देख कर आपको कुछ न देखा कभी
    उम्र भर आपका ही नज़ारा किए

    हाथ थामा न हमने किसी ग़ैर का
    एक बस आपको ही सहारा किए

    हमने अहल-ए-ख़िरद की न मानी कभी
    देखते ही हम इनसे किनारा किए

    क़ैद करके उसे अपनी बाहों में, फिर
    रात भर उसकी ज़ुल्फ़ें सँवारा किए

    हमने बदला नहीं ये तुफ़ैल-ए-सुकूँ
    हम उन्ही से मुहब्बत दुबारा किए
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    Aman Kumar Shaw "Haif"
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    मेरा सर तेरा आस्ताना है
    और क्या तुझको आज़माना है

    मैं तेरे दर की ख़ाक चूमूँगा
    तेरी मिट्टी मेरा ठिकाना है

    ख़ुद को वो फिर से भूल बैठा है
    फिर उसे आईना दिखाना है

    हम फ़क़ीरों का मोल क्या दोगे
    जिनकी ठोकर में ये ज़माना है

    क़ब्ल मेरे रहा था कौन यहाँ
    घर पे किसके ये घर बनाना है

    आदमी दरमियाँ में मरता है
    उस तरफ़ रब इधर ज़माना है

    आज फिर देर से वो आया है
    आज फिर होंठों पर बहाना है

    रेल गाड़ी भी आ चुकी होगी
    और चराग़ों को भी बुझाना है

    तुम नये हो पढ़ो बदन उसका
    रास्ता वैसे तो पुराना है

    लाश देखी है तुमने शाने पे
    लाश पे मेरी, मेरा शाना है

    वक़्त-ए-रुख़सत ये दिल को समझाया
    दो क़दम पे शराबख़ाना है

    सोज़-ए-दिल बढ़ता है तो बढ़ जाए
    गाइए लब पे जो तराना है

    ख़ौफ़ खाता हूँ घर में जाने से
    इतना तन्हा ये आशियाना है

    ज़ब्त की हद को छू के निकलेंगे
    देखकर उनको मुस्कुराना है

    एक तो क़ब्र है बहुत छोटी
    बोझ फिर मिट्टी का उठाना है

    ख़ुद से तस्दीक़ कर लिया तुझको
    अब किसे देखना दिखाना है

    कुछ तो मस्जिद भी दूर है घर से
    फिर दिल-ए-इन्साँ काफ़िराना है

    ज़िन्दगी इस क़दर बुरी भी नहीं
    'हैफ़' तू मिल तुझे बताना है
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    Aman Kumar Shaw "Haif"
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    "फ़िज़ूल"
    पैरों तले जो रौंदा गया मैं हूँ वो शजर
    मंज़िल को पा सका न जो ऐसा हूँ मैं सफ़र
    सागर हूँ ऐसा बुझ न सकी जिसकी तिश्नगी
    जिसपे न फ़स्ल उग सके ऐसी हूं मैं ज़मीं
    कोई समझ न पाया जिसे ऐसा हूँ बशर
    बसते हीं जो उजड़ गया ऐसा हूँ मैं नगर
    बारिश में जल गया कभी ऐसा मकान हूँ
    ता उम्र जो खुली नहीं ऐसी दुकान हूँ
    मंज़र हूँ ऐसा रास जो आता नहीं कभी
    ऐसा हूँ इक बदन‌ जो लुभाता नहीं कभी
    ज़ीनत है जिसकी लुट चुकी महफ़िल हूँ ऐसी मैं
    राहें ही जिसको खा गयी मंज़िल हूं ऐसी मैं
    पत्थर हूँ राह का जिसे ठोकर नसीब है
    ऐसा नसीब हूँ जिसे कमतर नसीब है
    गुलशन हूँ जो उजड़ गया फ़स्ले बहार में
    दामन हूँ एक मैला मैं गर्दो ग़ुबार में
    आँखों का हो सका न मैं काजल कभी यहाँ
    ज़ुल्फ़ों का हो सका न मैं बादल कभी यहाँ
    है फ़लसफ़ा अलग मेरा माना ये मैने भी
    है मतलबी सभी यहाँ जाना‌ ये मैने भी
    ऐ हमसफ़र तेरे लिए दुनिया तो मैं न था
    सागर था सूखा माना प दरिया तो मैं न था
    जंगल था इक उजाड़ शजर मुझमे‌ थोड़े थें
    लेकिन सुकूत से भरा सहरा तो मैं न था
    मैं मुख़्तसर सी दास्ताँ तुमने किया तवील
    ये दास्ताँ फ़िज़ूल है अब क्योंकि, दोस्त सुन
    ख़ैरात में किसी की मोहब्बत फ़िज़ूल है
    मिल जाए जो उधार वो उल्फ़त फ़िज़ूल है
    दोजख़ अगर है ज़िन्दगी दोजख़ ही फिर सही
    बदले में इसके जो मिले जन्नत फ़िज़ूल है
    इक ज़िन्दगी ही काफ़ी है सबके लिए यहाँ
    फिर इसके बाद ज़ीस्त की हसरत फ़िज़ूल है
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    Aman Kumar Shaw "Haif"
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    ज़ार ज़ार रोये हैं बार बार रोये हैं
    ज़िन्दगी तेरी ख़ातिर बेशुमार रोये हैं

    भीड़ ग़मगुसारों की साहिलों पे थी, सच है
    जो थे डूबने वाले ज़ार ज़ार रोये हैं

    अश्क- बारी गिन गिन के इश्क़ में नहीं लाज़िम
    हमसे ये न पूछो के कितनी बार रोये हैं

    होश में रखा हमने होंठो पे तबस्सुम पर
    मयकदा गये जब भी पुर ख़ुमार रोये हैं

    चैन कब पड़ा हमको इस जहान में आकर
    हम अज़ल से आख़िर तक बेक़रार रोये हैं

    ठीक वक़्त पे हमको रोना भी नहीं आया
    पूरी ज़िन्दगी हम तो बे-बहार रोये हैं

    पाक राहों पे चलकर ये सिला मिला हमको
    साफ़ जिस्म था लेकिन दाग़दार रोये हैं

    कुछ सिला मुहब्बत का 'हैफ़' को भी देते तुम
    रुख़सती ए जानां पे हम भी यार रोये हैं
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    Aman Kumar Shaw "Haif"
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    मौसम-ए-ज़िंदान बदले तो क़फ़स गुलज़ार हो
    क़ैदखाने को बदल कर लाभ कुछ होगा नहीं
    Aman Kumar Shaw "Haif"
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    ये सदा-ए-ग़ैब और फिर ये सदा-ए-दिल "अमन"
    हो सके क़ाफ़िर न हम तो हो सके ज़ाहिद यहाँ
    Aman Kumar Shaw "Haif"
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    छोड़िये मैं कौन हूँ क्या लगता हूँ मैं आपका
    शे'र जो अच्छा लगे तो दीजिये बस दाद आप
    Aman Kumar Shaw "Haif"
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    आलम-ए-वहशत में की है गुफ़्तगू दीवार से
    क़त्ले ख़ामोशी किया है ख़ंज़रो तलवार से

    यूँ नहीं बस देखने में लगते हैं बेदार से
    रतजगे कितने किए हैं पूछिए बीमार से

    दिन गुज़ारा कैसे हमने रात कैसे काटी है
    जानना गर हो तो पूछो इस दिले बेज़ार से

    मुफ़लिसी की आग में माना झुलस कर मर गये
    भीख में मांगी न दौलत पर किसी ज़रदार से

    क्यूँ समन्दर पीने बैठे पूछिए हमसे नहीं
    इन्तहां-ए-तिश्नगी बस देखिए अब्सार से

    काम लेते ही रहे हैं मुझसे मेरे दोस्त सब
    आप भी ले लीजिए कुछ काम मुझ बेगार से

    ख़ाक वो गुलशन हुआ जिसमे हसीं गुल खिलते थे
    अब तो ज़ीनत है चमन की चार सू बस ख़ार से

    लाख तस्वीरें बनाओ ख़ूब रंगो बू भरो
    कम हरिक तस्वीर होगी उसके बिन शहकार से

    लोग सारे शहर के हमदर्द मेरे बन गए
    पूछिए मत क्या मिला इस ग़म के कारोबार से

    बात दिल की दिल में ही मुझको दबाकर रखनी थी
    कहके तुझसे गिर गया मैं ख़ुद के ही मेयार से

    डूबने वाले "अमन" उस पार चिल्लाते रहे
    देखते सब रह गए बस दरिया के इस पार से
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    Aman Kumar Shaw "Haif"
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    मंज़िल-ए-मकसूद पा के भी सुकूँ हासिल नहीं
    आ गया मैं जिस जगह शायद मेरी मंज़िल नहीं

    आसरा है कश्तियों को साहिल-ए- आबाद का
    क्या सफ़ीनें काम आये गर कोई साहिल नहीं

    हौसले भी पस्त होते देखे हैं उनके यहाँ
    कहते थे जो बारहा के ज़िन्दगी मुश्किल नहीं

    घोटते हैं सब गला जब अपने अरमानों का याँ
    कौन फिर दावा करे के अपना वो क़ातिल नहीं

    पीठ पे खंज़र चुभो के इश्क़ में तू ख़ुश न हो
    होश खो बैठा मगर वो शख़्स है ग़ाफ़िल नहीं

    खींचती है ख़ाक सबको बारहा अपनी तरफ
    इसमे जब तक मिल न जाये आदमी कामिल नहीं

    लाश अपनी सर पे रखकर फिर रहा हूँ दर ब दर
    मेरे जैसा दुनिया में होगा कोई हामिल नहीं

    ढ़ूंढ़ना मुझको न यारो इस जहां की भीड़ में
    भीड़ का हिस्सा "अमन" हूँ भीड़ में शामिल नहीं
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    Aman Kumar Shaw "Haif"
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    नक़्श-ए- रह-ए विसाल मिटाता हूँ आज तक
    ख़ुद को मगर उसी का मैं पाता हूँ आज तक

    तरतीब से रखो न मुझे तुम किताब में
    बिखरा हुआ ही मैं उसे भाता हूँ आज तक

    उसकी गली ने ही मेरी लूटी है ज़िन्दगी
    उसकी गली की ख़ाक उड़ाता हूँ आज तक

    आह-ओ- फ़ुग़ान-ए- दर्द-ए- जिगर रंज-ए- ज़िन्दगी
    इनसे ही अपना पेट चलाता हूँ आज तक

    उस रहगुज़र की मौत तो कबकी ही हो चुकी
    हर शाम फिर किधर को मैं जाता हूँ आज तक

    शम्स-ए- ग़ुरूब देख के याद अपनी आती है
    हर शाम इक चराग़ बुझाता हूँ आज तक

    जिन होठों के नसीब में था तुझको चूमना
    उनसे ग़म-ए- हयात सुनाता हूँ आज तक

    हर शाम उनकी दीद की हसरत सी होती है
    हर शाम इक चराग़ जलाता हूँ आज तक

    अंधे तमाशबीनों पे करता भी क्या यकीं
    ख़ुद से ही आग घर की बुझाता हूँ आज तक

    कुछ दाग़ दिल में "हैफ़" के आबाद हैं अभी
    बज़्म-ए- हयात जिनसे सजाता हूँ आज तक
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    Aman Kumar Shaw "Haif"
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