ज़ार ज़ार रोए हैं बार बार रोए हैं

ज़िन्दगी तेरी ख़ातिर बेशुमार रोए हैं

भीड़ ग़मगुसारों की साहिलों पे थी, सच है
जो थे डूबने वाले ज़ार ज़ार रोए हैं

अश्क- बारी गिन गिन के इश्क़ में नहीं लाज़िम
हम से ये न पूछो के कितनी बार रोए हैं

होश में रखा हम ने होंठो पे तबस्सुम पर
मय-कदा गए जब भी पुर ख़ुमार रोए हैं

चैन कब पड़ा हम को इस जहान में आ कर
हम अज़ल से आख़िर तक बे-क़रार रोए हैं

ठीक वक़्त पे हम को रोना भी नहीं आया
पूरी ज़िन्दगी हम तो बे-बहार रोए हैं

पाक राहों पे चल कर ये सिला मिला हम को
साफ़ जिस्म था लेकिन दाग़दार रोए हैं

कुछ सिला मुहब्बत का 'हैफ़' को भी देते तुम
रुख़सती ए जानाँ पे हम भी यार रोए हैं

— Aman Kumar Shaw "Haif"

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