इतना मलाल क्यूँँ भला ऐसा भी क्या हुआ

थोड़ी शराब में तुझे इतना नशा हुआ

उस को ख़याले ज़ीस्त था मुझ को मलाले ग़म
वो भी फ़ना हुआ यहाँ मैं भी फ़ना हुआ

महफ़िल में आज आप की कुछ कम है रौशनी
उस पे ये दिल मिरा भी है कब से बुझा हुआ

ज़ख़्में बदन को देख के लगता है मुझ को के
दाग़े विसाल जैसे हो तन पे रखा हुआ

गाहे बगाहे जिस्म से बदबू सी आती है
ख़ुद के बदन में जैसे मैं ख़ुद हूँ गड़ा हुआ

बस होश खोना ही मेरा मक़्सद नहीं यहाँ
चाहत है मेरी के लगूँ सब को पिया हुआ

ता'उम्र तिश्नगी मेरी तरसी है आब को
ऐसी शदीद धूप में कोई जुदा हुआ

इस शम'ये दिल को बुझने में कुछ वक़्त बाकी है
इम्काने वस्ल अब भी है थोड़ा बचा हुआ

ज़िन्दा समझने की मुझे करना न भूल तू
सांसें "अमन" है चल रही पर हूँ मरा हुआ

— Aman Kumar Shaw "Haif"

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