Aman Kumar Shaw "Haif"

Aman Kumar Shaw "Haif"

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Aman Kumar Shaw "Haif" shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Aman Kumar Shaw "Haif"'s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

गिर्दाब में डूबा सफ़ीना याद आया तब ख़ुदा ता-उम्र हम उस नाख़ुदा की बन्दगी करते रहें — Aman Kumar Shaw "Haif"
आख़िरी सफ़ में रखा ऐ ज़िन्दगी तू ने मुझे तू पहुँचती उस सेे पहले मौत मुझतक आ गई — Aman Kumar Shaw "Haif"
आरज़ी थी ज़िन्दगी और दर्द पैहम थे मेरे दर्द को हम करते कम या ज़िन्दगी को देखते — Aman Kumar Shaw "Haif"
वुसअते सहरा भी कम पड़ जाएगी इक दिन "अमन" इस कदर आवारगी बढ़ती रही गर आप की — Aman Kumar Shaw "Haif"
ब-मुश्किल वक़्त तो कट जाएगा तेरे बा'द भी हमदम ज़रा सोचो मगर इस ज़िन्दगी का हाल क्या होगा — Aman Kumar Shaw "Haif"
ये सदा-ए-ग़ैब और फिर ये सदा-ए-दिल "अमन" हो सके क़ाफ़िर न हम तो हो सके ज़ाहिद यहाँ — Aman Kumar Shaw "Haif"
हादसात-ए-ज़िन्दगी कुछ कम न थे ऐ हम सफ़र उस पे तेरा छोड़ जाना ख़ाक मुझ को कर गया — Aman Kumar Shaw "Haif"
मकीं सारे मकाँ के चले गए कब के फ़क़त मैं हूँ यहाँ और ये सुकूत तारी है — Aman Kumar Shaw "Haif"
पाँव के छालों से पूछो ये सफ़र कैसा रहा मंज़िलों को क्या पता दुशवारियाँ कितनी मिली — Aman Kumar Shaw "Haif"
मौसम-ए-ज़िंदान बदले तो क़फ़स गुलज़ार हो क़ैदखाने को बदल कर लाभ कुछ होगा नहीं — Aman Kumar Shaw "Haif"
तन छुपाऊँ मन छुपाऊँ क्या करूँँ दर्पण छुपाऊँ हो रहा ज़ाहिर तू सब सेे कैसे ये जीवन छुपाऊँ — Aman Kumar Shaw "Haif"
रौनके महफ़िल से ले कर इस सुकूत-ए-मर्ग तक ज़िन्दगी तुझ को लिए हम दर-ब-दर फिरते रहे — Aman Kumar Shaw "Haif"
छोड़िये मैं कौन हूँ क्या लगता हूँ मैं आप का शे'र जो अच्छा लगे तो दीजिये बस दाद आप — Aman Kumar Shaw "Haif"
हैफ़ सद हैफ़ मौत आएगी हैफ़ सद हैफ़ मर चुका हूँ मैं — Aman Kumar Shaw "Haif"

Ghazal

राह-ए-हासिल का कुछ नहीं मालूम हम को मंज़िल का कुछ नहीं मालूम याद है लूटा है किसी ने मुझे शख़्स-ए- शामिल का कुछ नहीं मालूम जिस्म तो कब का बुझ चुका होगा हरकत-ए-दिल का कुछ नहीं मालूम राह-ए-आख़िर की धुंध याद है बस और मंज़िल का कुछ नहीं मालूम डूबने वालों में हैं शामिल हम हम को साहिल का कुछ नहीं मालूम सुर्ख़ हाथों को अपने देखा, पर मुझ को क़ातिल का कुछ नहीं मालूम तुम को बस क़त्ल से ही मतलब है तुम को बिस्मिल का कुछ नहीं मालूम उम्र गुज़री क़फ़स में याद है बस हम को आदिल का कुछ नहीं मालूम वो कहेगा ख़िरद ही सब कुछ है उस को इस दिल का कुछ नहीं मालूम सूरत-ए- 'हैफ़' पे हो हैराँ बहुत तुम को मुश्किल का कुछ नहीं मालूम — Aman Kumar Shaw "Haif"
ज़ार ज़ार रोए हैं बार बार रोए हैं ज़िन्दगी तेरी ख़ातिर बेशुमार रोए हैं भीड़ ग़मगुसारों की साहिलों पे थी, सच है जो थे डूबने वाले ज़ार ज़ार रोए हैं अश्क- बारी गिन गिन के इश्क़ में नहीं लाज़िम हम सेे ये न पूछो के कितनी बार रोए हैं होश में रखा हम ने होंठो पे तबस्सुम पर मय-कदा गए जब भी पुर ख़ुमार रोए हैं चैन कब पड़ा हम को इस जहान में आ कर हम अज़ल से आख़िर तक बे-क़रार रोए हैं ठीक वक़्त पे हम को रोना भी नहीं आया पूरी ज़िन्दगी हम तो बे-बहार रोए हैं पाक राहों पे चल कर ये सिला मिला हम को साफ़ जिस्म था लेकिन दाग़दार रोए हैं कुछ सिला मुहब्बत का 'हैफ़' को भी देते तुम रुख़सती ए जानाँ पे हम भी यार रोए हैं — Aman Kumar Shaw "Haif"
बस इक घाव को ही कुरेदा गया है इसी तरह हम को सताया गया है सुख़न में हमें लिखना था दर्द अपना जिगर के लहू को निचोड़ा गया है क़बा जो उतारूँ बदन गिर पड़ेगा ये किस हाल में मुझ को छोड़ा गया है मैं बाज़ार में आख़िरी शय था यारों घटा कर मेरा दाम बेचा गया है सर-ए- बज़्म फिर यूँँ हुआ के हमी को हमारा ही क़िस्सा सुनाया गया है कमी जब भी आई ग़मों की ग़ज़ल में ज़माने से इनको ख़रीदा गया है जहाँ भी गए साथ वहशत को ले कर वहीं से हमें फिर निकाला गया है ये पलकें यूँँ बेवज्ह भारी नहीं हैं ग़म-ए- ज़ीस्त इनपर ही लादा गया है कहाँ `हैफ़` ने जी है ये ज़िंदगानी समझिए कि बस वक़्त काटा गया है — Aman Kumar Shaw "Haif"
मंज़िल-ए-मकसूद पा के भी सुकूँ हासिल नहीं आ गया मैं जिस जगह शायद मेरी मंज़िल नहीं आसरा है कश्तियों को साहिल-ए- आबाद का क्या सफ़ीनें काम आए गर कोई साहिल नहीं हौसले भी पस्त होते देखे हैं उन के यहाँ कहते थे जो बारहा के ज़िन्दगी मुश्किल नहीं घोटते हैं सब गला जब अपने अरमानों का याँ कौन फिर दावा करे के अपना वो क़ातिल नहीं पीठ पे खंज़र चुभो के इश्क़ में तू ख़ुश न हो होश खो बैठा मगर वो शख़्स है ग़ाफ़िल नहीं खींचती है ख़ाक सब को बारहा अपनी तरफ़ इस में जब तक मिल न जाए आदमी कामिल नहीं लाश अपनी सर पे रख कर फिर रहा हूँ दर ब दर मेरे जैसा दुनिया में होगा कोई हामिल नहीं ढ़ूंढ़ना मुझ को न यारो इस जहाँ की भीड़ में भीड़ का हिस्सा "अमन" हूँ भीड़ में शामिल नहीं — Aman Kumar Shaw "Haif"
साहिलों पे डूबने का डर हीं मुझ को खा गया छोड़ के कश्ती भँवर में इस लिए मैं आ गया ज़िन्दगी थमती नहीं आग़ाज़ से अंजाम तक सोच कर ये मैं भी इस के साथ हीं बहता गया मत पुकारो अब मुझे तुम नाम मेरा ले के यूँँ था दिवाना मैं कभी पर अब तो मैं पगला गया वक़्त ने लूटी यहाँ सबकी बहारे ज़िन्दगी सोचता हूँ मैं कि जो मेरा गया तो क्या गया वक़्त ने उस शाख पे दो फूल रक्खे थे कभी कश्मकश में वक़्त की वो फूल भी मुरझा गया खो के सब कुछ ज़ीस्त में मालूम ये मुझ को हुआ कुछ नहीं खोया है मैं ने और सब कुछ पा गया सारे रिश्ते सारे नातें क़ाग़ज़ी थे मिट गए तन्हा आया था जहाँ में और मैं तन्हा गया कोशिशें तो ख़ूब की मैं ने कि कुछ भी कह सकूँ ऐन मौक़े' पे मगर आके "अमन" हकला गया — Aman Kumar Shaw "Haif"
नाकाम मोहब्बत की कहानी भी लिखेंगे क्यूँँ रायगाँ बीती ये जवानी भी लिखेंगे इक उम्र रखे लाश को घर में तरो ताज़ा फिर कैसे हुई लाश पुरानी भी लिखेंगे वो दाग़े जिगर छाले सभी पाँव के और फिर दिल के सभी ज़ख़्मो की निशानी भी लिखेंगे दरियाये नज़र आब से महरूम रहा क्यूँँ आँखों में नहीं आया जो पानी भी लिखेंगे तफ़्सील से बत लाएँगे हम मिसरो का मतलब अश्आर में लफ़्ज़ों के मआ'नी भी लिखेंगे जीते जी न गुल खिल सका इस दिल के चमन में तुर्बत पे हुई ख़ूब फ़िशानी भी लिखेंगे वो शाम तिरे बा'द जो फिर रास न आई कितनी थी "अमन" तब वो सुहानी भी लिखेंगे — Aman Kumar Shaw "Haif"
ज़ुल्म-ओ-सितम को उस के न रक्खा हिसाब में हँस के ही ज़ीस्त काटी है हम ने अज़ाब में जश्न-ए-फ़िराक़े यार में काटी है ज़िन्दगी यूँँ रायगाँ न लिख मुझे अपनी किताब में रौशन मिरे मलाल से चेहरा किसी का है रक्खा किसी ने है मुझे हर-पल अज़ाब में हसरत-ए-दीद पूरी हो कर्बे जिगर हो कम तू लाश अपनी भेज दे ख़त के जवाब में बारात उस की आई जनाज़ा मिरा उठा मैं था नक़ाब पोश थी वो भी हिजाब में गुज़रा तिरी गली से तो याद आया यक ब यक कितनी दफ़ा गुज़रते थे इनसे शबाब में किस मोड़ लाई आशिक़ी क्या हाल हो गया खूने जिगर है घुल रहा आँखों के आब में क़तरा बहा के ले गया घर बार सब मिरा सैलाब देखे ऐसे भी मैं ने हबाब में शामो सहर जो वस्ल की करता था ज़िद कभी बा'द ए फ़िराक़ "हैफ़" वो आया न ख़्वाब में — Aman Kumar Shaw "Haif"
शाम-ए-ख़ल्वत और तेरा कूचा भी वीरान है दिल में तेरी यादों का हर लम्हा इक तूफ़ान है फासला इतना कि पूरा हो न पाएगा कभी फिर भी दिल को तेरे आने का सदा इम्कान है उम्र भर शानो पे रख कर ढ़ोया है तू ने मुझे ऐ ग़म-ए-दिल तेरा भी मुझ पे बड़ा एहसान है ऐ मलाल-ए-शाम-ए-ग़म तू साथ मुझ को ले के चल हाल आख़िर तेरा मेरा हर कदम यकसान है आँधियों से लड़ने का है हौसला मुझ में नहीं शख़्सियत मेरी तो यारों तिनको सी बेजान है इशरत-ए-दुनिया को ठुकरा कर अभी हीं लौटा हूँ मातम- ए-दुनिया तू कर के दिल मिरा हलकान है मय-कदे में ज़िन्दगी गुज़री है उस की इस लिए हर तरह के आदमी की उस को याँ पहचान है मुख़्तसर सी ये नवाज़िश आप की फिर इश्क़ में इस गम-ए-हिज्राँ का मातम कब यहाँ आसान है चंद आहें ज़ख़्म-ए-दिल और ये अज़िय्यत ज़ीस्त की इनसे हीं तो "हैफ़" की महफ़िल की सारी शान है — Aman Kumar Shaw "Haif"
ज़ख़्म -ए-हयात को अभी नासूर होना है हंगामा ज़ीस्त में अभी भरपूर होना है वस्ल-ओ- फ़िराक़ आशिक़ी बच्चों के खेल हैं मुझ को तो तेरी माँग का सिन्दूर होना है मुझ सेे फ़िराक़ के न बहाने तू ढ़ूंढ़ा कर कह दे मुझे तू साफ कि अब दूर होना है इस तीरगी-ए-राह को रखना तू साथ में इन जुगनुओं को भी कभी बेनूर होना है कह दे कि हादसों से जी भरता नहीं तेरा कह दे कि तुझ को और भी रंजूर होना है तलवों को चाट कर के वो मशहूर हो गए मुझ को तो अपने दम पे याँ मशहूर होना है मोहलत दे मुझ को ऐ क़ज़ा कुछ देर की अभी रंज-ओ- अलम- ए- ज़ीस्त का मशकूर होना है हम हैं चराग़-ए- आख़िरी हम को बचाइये हम से ही घर में सुब्ह तलक नूर होना है ये ज़िंदगी भी शीशे के जैसी है दोस्तों इक रोज़ टूट कर इसे याँ चूर होना है हर शख़्स के ज़बान पे क़िस्सा ए "हैफ़" है सब को हीं ज़ीस्त-ए-"हैफ़" का मज़कूर होना है — Aman Kumar Shaw "Haif"
मेरा सर तेरा आस्ताना है और क्या तुझ को आज़माना है मैं तेरे दर की ख़ाक चूमूँगा तेरी मिट्टी मेरा ठिकाना है ख़ुद को वो फिर से भूल बैठा है फिर उसे आईना दिखाना है हम फ़क़ीरों का मोल क्या दोगे जिन की ठोकर में ये ज़माना है क़ब्ल मेरे रहा था कौन यहाँ घर पे किस के ये घर बनाना है आदमी दरमियाँ में मरता है उस तरफ़ रब इधर ज़माना है आज फिर देर से वो आया है आज फिर होंठों पर बहाना है रेल गाड़ी भी आ चुकी होगी और चराग़ों को भी बुझाना है तुम नए हो पढ़ो बदन उस का रास्ता वैसे तो पुराना है लाश देखी है तुम ने शाने पे लाश पे मेरी, मेरा शाना है वक़्त-ए-रुख़सत ये दिल को समझाया दो क़दम पे शराबख़ाना है सोज़-ए-दिल बढ़ता है तो बढ़ जाए गाइए लब पे जो तराना है ख़ौफ़ खाता हूँ घर में जाने से इतना तन्हा ये आशियाना है ज़ब्त की हद को छू के निकलेंगे देख कर उन को मुस्कुराना है एक तो क़ब्र है बहुत छोटी बोझ फिर मिट्टी का उठाना है ख़ुद से तस्दीक़ कर लिया तुझ को अब किसे देखना दिखाना है कुछ तो मस्जिद भी दूर है घर से फिर दिल-ए-इन्साँ काफ़िराना है ज़िन्दगी इस क़दर बुरी भी नहीं 'हैफ़' तू मिल तुझे बताना है — Aman Kumar Shaw "Haif"
आँखें बनाइए कभी दरिया बनाइए मर्ज़ी हो जैसी आप की वैसा बनाइए आँखों के नीचे काले जो धब्बे हैं बेशुमार उन की जगह पे आप जनाज़ा बनाइए आग़ाज़ पे बनाइए रौशन मेरा मकाँ अंजाम पे चराग़ों को बुझता बनाइए दाग़-ए-बदन बनाइए इक इक सलीक़े से चेहरे को आप मेरे प हँसता बनाइए तर्ज़-ओ-हुनर का दीजिये कुछ तो सबूत आप ख़ून-ए-जिगर को आँखों से बहता बनाइए सब कुछ न डूब जाए कही इस के आब में आँखों के दरिया को ज़रा उथला बनाइए सब कुछ उड़ा ले जाएगा तूफां ये वक़्त का मजबूत दर-दिवार को जितना बनाइए गुज़रा ज़माना "हैफ़" का वो कहते रहना के ऐसा बनाइए कभी वैसा बनाइए — Aman Kumar Shaw "Haif"
आलम-ए-वहशत में की है गुफ़्तगू दीवार से क़त्ले ख़ामोशी किया है ख़ंज़रो तलवार से यूँँ नहीं बस देखने में लगते हैं बेदार से रतजगे कितने किए हैं पूछिए बीमार से दिन गुज़ारा कैसे हम ने रात कैसे काटी है जानना गर हो तो पूछो इस दिल-ए- बेज़ार से मुफ़लिसी की आग में माना झुलस कर मर गए भीख में माँगी न दौलत पर किसी ज़रदार से क्यूँँ समुंदर पीने बैठे पूछिए हम सेे नहीं इन्तहां-ए-तिश्नगी बस देखिए अब्सार से काम लेते ही रहे हैं मुझ सेे मेरे दोस्त सब आप भी ले लीजिए कुछ काम मुझ बेगार से ख़ाक वो गुलशन हुआ जिस में हसीं गुल खिलते थे अब तो ज़ीनत है चमन की चार सू बस ख़ार से लाख तस्वीरें बनाओ ख़ूब रंगो बू भरो कम हरिक तस्वीर होगी उस के बिन शहकार से लोग सारे शहर के हमदर्द मेरे बन गए पूछिए मत क्या मिला इस ग़म के कारोबार से बात दिल की दिल में ही मुझ को दबा कर रखनी थी कहके तुझ सेे गिर गया मैं ख़ुद के ही मेआ'र से डूबने वाले "अमन" उस पार चिल्लाते रहे देखते सब रह गए बस दरिया के इस पार से — Aman Kumar Shaw "Haif"
नज़रो में सबकी माना कि छोटा सा हो गया देखा कभी जो माँ ने मैं आला सा हो गया बे-लौस हीं गुज़र गया महफ़िल से उस के मैं होना मेरा ये जैसे न होना सा हो गया इक वक्त-ए-मुख़्तसर मिला मुझ को हयात में आए अभी जहाँ में कि जाना सा हो गया ता ज़िन्दगी सज़ा मुझे मिलती रही यहाँ जैसे किया हो जो यहाँ गुन्हा सा हो गया जल कर चराग़ बुझ गए उम्र-ए- रवान के दरिया-ए- रौशनी मेरा सूखा सा हो गया इतना फ़क़त कहा था कि करता हूँ प्यार मैं इकरार होता क्या भला झगड़ा सा हो गया आँखें उधार दी जिसे वक्त-ए- ख़राब में बारी मेरी जो आई वो अंधा सा हो गया साक़ी तेरी नज़र का हवाला दूँ क्या बता देखी तेरी निगाह कि पीना सा हो गया उस सेे बिछड़ के ख़ाक में मिलना था तय मेरा मुझ सेे बिछड़ के वो भी तो अदना सा हो गया उस ने कहा जो हँस के कि कैसे हो तुम "अमन" आँसू बगैर ही तभी रोना सा हो गया — Aman Kumar Shaw "Haif"
हबाब-ए-आब के जैसी हक़ीक़त ज़िन्दगी की है कोई जो जी रहा है तो इनायत ज़िन्दगी की है सबब मरने का भी मुज़्मर इसी में है कहीं देखो क़ज़ा जो ख़ूब-सूरत है सबाहत ज़िन्दगी की है मलाले ग़म कहीं पे तो कहीं जश्ने ख़ुशी देखा शिक़ायत हो भी क्या आख़िर निज़ामत ज़िन्दगी की है कहाँ मुमकिन था तेरे बा'द जी लेना मिरे हमदम ये सांसें चल रही है जो सख़ावत ज़िन्दगी की है ग़मे दिल की ही क़ीमत पर तुझे ये ज़ीस्त कैसे दूँ तू वाजिब दाम बतला के तिजारत ज़िन्दगी की है वो रोज़ ओ शब के हंगा में गुज़िश्ता ज़िन्दगी के ग़म मिलेंगे सब तुझे इस में हिकायत ज़िन्दगी की है न रोता है कोई मुझ में न हँसता है कोई मुझ में लगा सदमा कोई दिल को या वहशत ज़िन्दगी की है अँधेरा हीं अँधेरा है दिल-ए- वीरान में हमदम "अमन" तुम लौट आओ के ज़रूरत ज़िन्दगी की है — Aman Kumar Shaw "Haif"
इतना मलाल क्यूँँ भला ऐसा भी क्या हुआ थोड़ी शराब में तुझे इतना नशा हुआ उस को ख़याले ज़ीस्त था मुझ को मलाले ग़म वो भी फ़ना हुआ यहाँ मैं भी फ़ना हुआ महफ़िल में आज आप की कुछ कम है रौशनी उस पे ये दिल मिरा भी है कब से बुझा हुआ ज़ख़्में बदन को देख के लगता है मुझ को के दाग़े विसाल जैसे हो तन पे रखा हुआ गाहे बगाहे जिस्म से बदबू सी आती है ख़ुद के बदन में जैसे मैं ख़ुद हूँ गड़ा हुआ बस होश खोना ही मेरा मक़्सद नहीं यहाँ चाहत है मेरी के लगूँ सब को पिया हुआ ता'उम्र तिश्नगी मेरी तरसी है आब को ऐसी शदीद धूप में कोई जुदा हुआ इस शम'ये दिल को बुझने में कुछ वक़्त बाकी है इम्काने वस्ल अब भी है थोड़ा बचा हुआ ज़िन्दा समझने की मुझे करना न भूल तू सांसें "अमन" है चल रही पर हूँ मरा हुआ — Aman Kumar Shaw "Haif"
पिलाओ ख़ूब रिन्दों को करो आबाद मयख़ाना यहाँ के लोग कहते हैं नहीं अब याद मयख़ाना सुकूँ मिलता यहाँ आ कर इलाज-ए-ग़म भी होता है यहाँ पे ग़म के मारों की है हर फ़रियाद मयख़ाना सिखाया है यहाँ इसने सबक़ हम को ज़माने का हर इक उस्ताद से बढ़कर है ये उस्ताद मयख़ाना गरीबों को नहीं फ़ुर्सत यहाँ रोटी कमाने से अमीरों के ही हाथों की है ये ईजाद मयख़ाना झलक इक तेरी पाने को यहाँ हर शख़्स आता था गए तुम छोड़ के जब से हुआ बर्बाद मयख़ाना फ़िराक़-ए-यार में हम ने "अमन" बस है यही चाहा रहे आबाद मेरा दिल रहे आबाद मयख़ाना — Aman Kumar Shaw "Haif"
न लुत्फ़-ए-दीद अब कोई तेरी तस्वीर-ओ-सूरत में हुआ मैं बे-असर कुछ इस तरह तेरी नदामत में ये याद-ए-रफ्तगाँ रंज-ओ-अलम और ये मलाल-ए-ग़म हमारे साथ ही ये दफ़्न होगें अब तो तुर्बत में सियह-बख़्ती ये काली रात और ये टूटती साँसें कहीं मैं मर न जाऊँ ख़ौफ़ से इस तुंद वहशत में ये तेरी गुल फ़िशानी क़ब्र पे और शोर ये तेरा मुझे आराम से सोने नहीं देते हैं ख़ल्वत में जिगर के ज़ख़्म को हम ने कहा है ज़ख़्म शे'रों में न क़िस्सागोई की हम ने ग़म-ए-दिल की वज़ाहत में ये दिल शफ़्फ़ाफ़ था कितना फ़क़त मैं ही था जब मुझ में मेरी हस्ती कहीं फिर खो गई मेरी कसाफ़त में उसे देखो उसे परखो अभी भी 'हैफ़' है वो ही जिसे तुम छोड़ आए थे कभी मरने की हालत में — Aman Kumar Shaw "Haif"
जो जीते जी न आए वो अज़ादारी को आएँगे अभी कुछ लोग मदफ़न पे अदाकारी को आएँगे मुझे ये रात में भी चैन से सोने नहीं देंगे कुछ इक हैं ख़्वाब जो नींदों में ग़म-ख़्वारी को आएँगे यक़ीं गर हो नहीं आवाज़ देकर के ज़रा देखो मेरे पाले हुए ग़म हैं वफ़ादारी को आएँगे लहू का एक भी कतरा मेरा ज़ाया' नहीं होगा हैं मुस्तक़बिल के ग़म बाकी जो ख़ूँ- ख़्वारी को आएँगे इलाज-ए-ग़म ही बस करते मुझे तुम ने यहाँ देखा अभी तुम देखना कुछ लोग बीमारी को आएँगे कहो झुठलाओगे कैसे मेरे अश्कों के सागर को कयी दरिया हैं जो मेरी तरफ़दारी को आएँगे हुदूद-ए- ग़म कहा क्या अब भी बाकी है, अभी कुछ लोग हमारे बा'द भी या'नी ग़ज़ल कारी को आएँगे मुझे बेबस करेंगे पहले वो मा'ज़ूर होने तक वो ही फिर ले के बैसाखी मदद-गारी को आएँगे — Aman Kumar Shaw "Haif"

Nazm

"फ़िज़ूल" पैरों तले जो रौंदा गया मैं हूँ वो शजर मंज़िल को पा सका न जो ऐसा हूँ मैं सफ़र सागर हूँ ऐसा बुझ न सकी जिस की तिश्नगी जिस पे न फ़स्ल उग सके ऐसी हूँ मैं ज़मीं कोई समझ न पाया जिसे ऐसा हूँ बशर बसते हीं जो उजड़ गया ऐसा हूँ मैं नगर बारिश में जल गया कभी ऐसा मकान हूँ ता उम्र जो खुली नहीं ऐसी दुकान हूँ मंज़र हूँ ऐसा रास जो आता नहीं कभी ऐसा हूँ इक बदन‌ जो लुभाता नहीं कभी ज़ीनत है जिस की लुट चुकी महफ़िल हूँ ऐसी मैं राहें ही जिस को खा गई मंज़िल हूँ ऐसी मैं पत्थर हूँ राह का जिसे ठोकर नसीब है ऐसा नसीब हूँ जिसे कमतर नसीब है गुलशन हूँ जो उजड़ गया फ़स्ले बहार में दामन हूँ एक मैला मैं गर्दो ग़ुबार में आँखों का हो सका न मैं काजल कभी यहाँ ज़ुल्फ़ों का हो सका न मैं बादल कभी यहाँ है फ़लसफ़ा अलग मेरा माना ये मैं ने भी है मतलबी सभी यहाँ जाना‌ ये मैं ने भी ऐ हम सफ़र तेरे लिए दुनिया तो मैं न था सागर था सूखा माना प दरिया तो मैं न था जंगल था इक उजाड़ शजर मुझ में‌ थोड़े थे लेकिन सुकूत से भरा सहरा तो मैं न था मैं मुख़्तसर सी दास्ताँ तुम ने किया तवील ये दास्ताँ फ़िज़ूल है अब क्योंकि, दोस्त सुन ख़ैरात में किसी की मोहब्बत फ़िज़ूल है मिल जाए जो उधार वो उल्फ़त फ़िज़ूल है दोजख़ अगर है ज़िन्दगी दोजख़ ही फिर सही बदले में इस के जो मिले जन्नत फ़िज़ूल है इक ज़िन्दगी ही काफ़ी है सबके लिए यहाँ फिर इस के बा'द ज़ीस्त की हसरत फ़िज़ूल है — Aman Kumar Shaw "Haif"
"सफ़र ए ज़िन्दगी" बेशक मैं ज़वाल हूँ तेरा ही कमाल हूँ जो हल कभी न हो सके मैं ऐसा एक सवाल हूँ फ़िराक़ हूँ विसाल हूँ हर सम्त मैं निढ़ाल हूँ ख़ुद का ही हूँ मैं हम सफ़र ख़ुद का ही मैं ख़याल हूँ ऐ ज़िन्दगी मैं क्या कहूँ मैं क्या पढ़ूं मैं क्या लिखूँ जो लिख रहा हूँ झूठ है जो कह रहा हूँ वो सच नहीं एक राह ए हयात है एक तवील रात है सियाह है ये रात भी अंधेर मेरा घर है एक रौशनी है चुभ रही एक तीरगी से रब्त है वुजूद अपना जानने को ख़ुद को पहचानने को फिर रहा हूँ दर ब दर न जाने राह कौन सी न जाने किस की चाह है एक हम सफ़र जो था कभी एक राहबर जो था कभी एक ज़िन्दगी जो तब भी थी एक ज़िन्दगी जो अब भी है फर्क़ है फर्क़ है ऐ दोस्त तेरी चाह में ऐ दोस्त तेरी राह में फर्क़ है फर्क़ है तुझे है आरज़ू ए दुनिया मेरे लिए जो ख़ाक है तेरा रास्ता है मुख़्तलिफ़ मेरा रास्ता है मुख़्तलिफ़ तुम चाहते हो मैं कहूँ रंजो ग़म दुश्वारियाँ पर मेरी ख़ामोशी पे मुझ को बहुत ऐतिबार है तो काम ऐसा करें तुम छोड़ दो मुझ को मेरे हाल पे जवाब पे सवाल पे उम्र के किसी पड़ाव पर जो मैं जो तुझ सेे मिल गया इत्तेफ़ाक़ से तो कह देना ये शख़्स बा कमाल है पर ऐ हम सफ़र उस वक़्त भी कहूंगा मैं जो हल कभी न हो सके एक ऐसा मैं सवाल हूँ बेशक मैं ज़वाल हूँ कमाल हूँ कमाल हूँ — Aman Kumar Shaw "Haif"
"मरता रहा हूँ मैं" हर रोज़ ज़िन्दगी जीने की कोशिश में हर रोज़ ख़ुद को पा लेने की ख़्वाहिश में मरता रहा हूँ मैं मरता रहा हूँ मैं न जाने किस सफ़र में हूँ न जाने कौन सा शहर में हूँ ज़िन्दगी कश्मकश में गुज़रती है कहाँ आ कर ज़िन्दगी ये ठहरती है कहा जाने को था कहाँ पहूँचा हूँ कि ख़ुद से ख़ुद की रंजिश में मरता रहा हूँ मैं मरता रहा हूँ मैं कब किसे थी ख़बर हाल ऐसा होगा दिन, महिना और साल ऐसा होगा सफ़र ये क्यूँँ भला दुश्वार है ज़िन्दगी क्या ज़िन्दगी के पार है अनगिनत प्रश्नों के मेले में पड़ गया हूँ शायद किसी झमेले में राह नहीं मंजिल नहीं कश्ती नहीं साहिल नहीं क़ैद होकर शायद किसी बंदिश में मरता रहा हूँ मैं मरता रहा हूँ मैं हम सफ़र बस ख़याल है कौन किस के साथ है बस कहने की बात है तुम कहती हो कि तुम मेरी हो मुझ को तुम क्या घेरी हो मैं ख़ुद भी ख़ुद का हो न सका कैसे तेरा हो पाऊँगा यही हक़ीक़त है ज़िन्दगी की यही अज़ीयत है ज़िन्दगी की तुम मुझ सेे नफ़रत करो बस तुम्हें ये समझाने की कोशिश में मरता रहा हूँ मैं मरता रहा हूँ मैं — Aman Kumar Shaw "Haif"