शाम-ए-ख़ल्वत और तेरा कूचा भी वीरान है

दिल में तेरी यादों का हर लम्हा इक तूफ़ान है

फासला इतना कि पूरा हो न पाएगा कभी
फिर भी दिल को तेरे आने का सदा इम्कान है

उम्र भर शानो पे रख कर ढ़ोया है तू ने मुझे
ऐ ग़म-ए-दिल तेरा भी मुझ पे बड़ा एहसान है

ऐ मलाल-ए-शाम-ए-ग़म तू साथ मुझ को ले के चल
हाल आख़िर तेरा मेरा हर कदम यकसान है

आँधियों से लड़ने का है हौसला मुझ
में नहीं
शख़्सियत मेरी तो यारों तिनको सी बेजान है

इशरत-ए-दुनिया को ठुकरा कर अभी हीं लौटा हूँ
मातम- ए-दुनिया तू कर के दिल मिरा हलकान है

मय-कदे में ज़िन्दगी गुज़री है उस की इस लिए
हर तरह के आदमी की उस को याँ पहचान है

मुख़्तसर सी ये नवाज़िश आप की फिर इश्क़ में
इस गम-ए-हिज्राँ का मातम कब यहाँ आसान है

चंद आहें ज़ख़्म-ए-दिल और ये अज़िय्यत ज़ीस्त की
इनसे हीं तो "हैफ़" की महफ़िल की सारी शान है

— Aman Kumar Shaw "Haif"

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