ज़ख़्म -ए-हयात को अभी नासूर होना है

हंगामा ज़ीस्त में अभी भरपूर होना है

वस्ल-ओ- फ़िराक़ आशिक़ी बच्चों के खेल हैं
मुझ को तो तेरी माँग का सिन्दूर होना है

मुझ से फ़िराक़ के न बहाने तू ढ़ूंढ़ा कर
कह दे मुझे तू साफ कि अब दूर होना है

इस तीरगी-ए-राह को रखना तू साथ में
इन जुगनुओं को भी कभी बेनूर होना है

कह दे कि हादसों से जी भरता नहीं तेरा
कह दे कि तुझ को और भी रंजूर होना है

तलवों को चाट कर के वो मशहूर हो गए
मुझ को तो अपने दम पे याँ मशहूर होना है

मोहलत दे मुझ को ऐ क़ज़ा कुछ देर की अभी
रंज-ओ- अलम- ए- ज़ीस्त का मशकूर होना है

हम हैं चराग़-ए- आख़िरी हम को बचाइये
हम से ही घर में सुब्ह तलक नूर होना है

ये ज़िंदगी भी शीशे के जैसी है दोस्तों
इक रोज़ टूट कर इसे याँ चूर होना है

हर शख़्स के ज़बान पे क़िस्सा ए "हैफ़" है
सब को हीं ज़ीस्त-ए-"हैफ़" का मज़कूर होना है

— Aman Kumar Shaw "Haif"

More by Aman Kumar Shaw "Haif"

Other ghazal from the same pen

See all from Aman Kumar Shaw "Haif" →

Taareef Shayari Collection

Shers of taareef shayari collection.

All Taareef Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling