jo bach gaye hain charaagh unko bachaaye rakho | जो बच गए हैं चराग़ उनको बचाये रक्खो

  - Azm Shakri

जो बच गए हैं चराग़ उनको बचाये रक्खो
मै चाहता हूँ हवा से रिश्ता बनाये रक्खो

  - Azm Shakri

Nature Shayari

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    बुरी सरिश्त न बदली जगह बदलने से
    चमन में आ के भी काँटा गुलाब हो न सका
    Arzoo Lakhnavi
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    गुलशन से कोई फूल मयस्सर न जब हुआ
    तितली ने राखी बाँध दी काँटे की नोक पर
    Unknown
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    कोई तितली पकड़ लें अगर
    फूल पर रख दिया कीजिए
    Vikas Rana
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    सभी रिश्तें मैं यूँ बचाए हूँ जैसे
    तड़पते दियों को हवा देते रहना
    Parul Singh "Noor"
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    किसी के होठ समंदर में भी तरसते रहे
    किसी की प्यास को सहरा में मिल गया पानी
    Ajeetendra Aazi Tamaam
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    दवा की सीसियों में ज़िन्दगी है
    Umesh Maurya
    ये जिस्म तंग है सीने में भी लहू कम है
    दिल अब वो फूल है जिस में कि रंग-ओ-बू कम है
    Pallav Mishra
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    ख़ुद को मनवाने का मुझको भी हुनर आता है
    मैं वो कतरा हूँ समंदर मेरे घर आता है
    Waseem Barelvi
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    पहले पानी को और हवा को बचाओ
    ये बचा लो तो फिर ख़ुदा को बचाओ
    Swapnil Tiwari
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    ज़ख़्म है दर्द है दवा भी है
    जैसे जंगल है रास्ता भी है

    यूँ तो वादे हज़ार करता है
    और वो शख्स भूलता भी है

    हम को हर सू नज़र भी रखनी है
    और तेरे पास बैठना भी है

    यूँ भी आता नहीं मुझे रोना
    और मातम की इब्तिदा भी है

    चूमने हैं पसंद के बादल
    शाम होते ही लौटना भी है
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    Karan Sahar

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As you were reading Shayari by Azm Shakri

    लाखों सदमें ढेरों ग़म, फिर भी नहीं हैं आंखें नम
    इक मुद्दत से रोए नहीं, क्या पत्थर के हो गए हम

    यूं पलकों पे हैं आँसू, जैसे फूलों पर शबनम
    ख़्वाब में वो आ जाते हैं, इतना तो रखते हैं भरम

    हम उस बस्ती में हैं जहाँ, धूप ज़ियादा साये कम
    अब ज़ख्मों में ताब नहीं, अब क्यों लाए हो मरहम
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    Azm Shakri
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    ज़ख़्म जो तुम ने दिया वो इस लिए रक्खा हरा
    ज़िंदगी में क्या बचेगा ज़ख़्म भर जाने के बाद
    Azm Shakri
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    दिल में हसरत कोई बची ही नहीं
    आग ऐसी लगी बुझी ही नहीं

    उस ने जब ख़ुद को बे-नक़ाब किया
    फिर किसी की नज़र उठी ही नहीं

    जैसा इस बार खुल के रोए हम
    ऐसी बारिश कभी हुई ही नहीं

    ज़िंदगी को गले लगाते क्या
    ज़िंदगी उम्र-भर मिली ही नहीं

    मुंतज़िर कब से चाँद छत पर है
    कोई खिड़की अभी खुली ही नहीं

    मैं जिसे अपनी ज़िंदगी समझा
    सच तो ये है वो मेरी थी ही नहीं
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    Azm Shakri
    शब की आग़ोश में महताब उतारा उस ने
    मेरी आँखों में कोई ख़्वाब उतारा उस ने
    Azm Shakri
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    वक़्त-ए-रुख़्सत आब-दीदा आप क्यूँ हैं
    जिस्म से तो जाँ हमारी जा रही है
    Azm Shakri
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